स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता
लेख- पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर
ता 17 अगस्त 2025 रविवार
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विषय....स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता
लेख क्रमांक 7
मेरे प्यारे साथियों और बहनों, डॉ सुभाष पालेकर का विनम्र नमस्कार
सन 1776 के पूर्व में हजारों सालों से प्रादेशिक साम्राज्य वाद फैला हुआ था, तब दुनिया की आर्थिक व्यवस्था उन दिनों जिन्हें नगर श्रेष्ठी कहा जाता था उन बड़े साहुकारों के हाथों में थी, वे साहूकार किसानों को कर्ज देते थे और युद्ध लड़ने के लिए राजाओं को भी कर्ज देते थे। माने पूरे दुनिया पर साहूकारों का ही अप्रत्यक्ष अमल था। सन 1776 को जेम्स वॉट ने बाष्प पर चलने वाला यंत्र मानवी सभ्यता में पहली बार खोज निकाला और प्रादेशिक साम्राज्य वाद का रूपांतरण आर्थिक साम्राज्य वाद में हो गया। और ग्रामीण विकास के स्थान पर शहरी विकास और उद्योग विकास को प्रधान्य क्रम दिया गया।
अब पुराने नगर श्रेष्ठी साहूकार बदल गए, उनके जगह पर नए वैश्विक साहूकार आ गए ,जिन्हें पूंजी निवेशक capital invester कहते है। उन्होंने अपनी पूंजी को विश्व अधिकोष world bank, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि international monetary fund, आशियान विकास अधिकोष Asian Development Bank, यूरोप विकास अधिकोष Europe development bank, इन आर्थिक कोषों की स्थापना की और उनके माध्यम से दुनिया के सरकारों को और उद्योगों को पूंजी निवेश देना शुरू किया।आज पूरे दुनिया पर इन पूंजी निवेशक साहूकारों का कब्जा है। इनसे कर्ज दुनिया की तमाम सरकार लेती है, उद्योजक कंपनियां लेती है। आज दुनिया की सभी सरकार इन के कर्ज के पहाड़ों की नीचे दबी हुई है, अब उन्हें ठीक से सांस लेना कठिन हो गया है।
दुनिया में सर्वश्रेष्ठ वैश्विक आर्थिक सम्राट कौन बने, 342 अरब डॉलर वाले श्री एलान मस्क पहले नंबर पर बरकार रहे या उनकी नंबर एक की जगह 216 अरब डॉलर वाले श्री मार्क झूकर बर्ग या 215 अरब डॉलर वाले श्री जेफ बेज़ोस काबिज करे, यह निश्चित करने वाले उनकी वस्तुएं या सेवाएं खरीदने वाले अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता माने आम जनता होती है। लेकिन, उनके बीच में चलने वालीं व्यापारी प्रति स्पर्धा से किसी देश के अर्थ व्यवस्था का भला नहीं होता है। उल्टा देश कर्जे में डूबने लगते है। उदाहरण के लिए अमेरिका की बात करेंगे।
आज अमेरिका की अर्थ व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थ सम्राट व्यवस्था है, भारत के अर्थ व्यवस्था से आठ गुना बड़ी है। अमेरिका का सकल घरेलू उत्पादन Gross Domestic Production GDP 30.507 लाख करोड़ डॉलर ( 30.5 trillion dollar ) माने 2593.09 लाख करोड़ रुपए हैं। 30 लाख करोड़ डॉलर माने इस 3 आंकड़े के सामने 13 बार शून्य डालना है। लेकिन, अमेरिका देश के माथे पर आज 36 लाख करोड़ डॉलर माने 3060 लाख करोड़ trillion रुपए का कर्ज loan है, जो अमेरिका के सकल घरेलू उत्पादन से 136 प्रतिशत ज्यादा है। माने दुनिया की नंबर एक अर्थ सम्राट अर्थ व्यवस्था कर्जे में डूबी है। यह दोष अमेरिका के अध्यक्ष का नहीं है, यह दोष है पाश्चात्य अंतर्विरोध होने वाली गलत अर्थ शास्त्र का है,जो साहूकारी चक्रव्यूह में फंसा हुआ हैं। इसीलिए अमरीका के अध्यक्ष श्री डोनाल्ड ट्रंप इस कर्ज को घटाने के लिए पूरी दुनिया से अमेरिका में आने वाले वस्तुओ पर जबरदस्त 25 से 50 प्रतिशत आयात कर लगा रहे है। यह उनकी उनके देश को कर्ज का कर्ज घटाने की और कर्ज के भयावह दुष्परिणामों से देश को बचाने की निति उनकी देश भक्ति है। उन्हें दोष देना गलत है। हमे सिर्फ यह देखना है कि हम हमारे देश के ऊपर हो रहे टैरिफ युद्ध के आर्थिक आक्रमण से देश को कैसे बचाए। यह सिर्फ अधिकाधिक सर्वोत्तम असल भारतीय स्वदेशी से ही संभव है। दुनिया के वैश्वीकरण globalization से दुनिया के सभी देश परस्पर आर्थिक लेन देन में एक दूसरे से इतने करीब आए है कि अब संपूर्ण स्वदेशी संभव नहीं है।
दूसरी ओर जापान का सकल घरेलू उत्पादन Gross Domestic Production GDP अमेरिका के तुलना में सिर्फ 4.186 लाख करोड़ डॉलर माने 355.81 लाख करोड़ रुपए है। माने अमेरिका की अर्थ व्यवस्था जापान के अर्थ व्यवस्था से लगभग आठ गुना बड़ी है। दोनों उद्योग प्रधान अर्थ व्यवस्थाये है। पूर्व में जापान की अर्थ व्यवस्था अमेरिका के अर्थ व्यवस्था से बहुत आगे थी, आज बहुत पीछे है। यह चक्कर पाश्चात्य अर्थ शास्त्र के
मर्यादाओं को प्रगट करता है।
किसी देश की सबसे बड़ी विकसित अर्थ व्यवस्था आमदनी से कई अधिक कर्जे में डूबी है, क्या यह विकास है? या सूजन है ? ख्याल रखिए कि सूजन बीमारी का लक्षण होता हैं, स्वास्थ्य का नहीं। यह अमेरिका के अर्थ व्यवस्था की बीमारी सूचक सूजन swelling है, स्वास्थ्य नहीं हैं। केवल अमेरिका ही नहीं, भारत समेत दुनिया के तमाम देशों की अर्थ व्यवस्थाएं बीमार हैं।
भारत और जापान का सकल घरेलू उत्पादन लगभग समान है,....भारत का सकल घरेलू उत्पादन 4.187 लाख करोड़ डॉलर और जापान का 4.186 लाख करोड़ डॉलर। भारत दुनिया की चौथी सर्वोच्च आर्थिक सम्राट अर्थ व्यवस्था है, जापान की पांचवीं सर्वोच्च आर्थिक सम्राट अर्थ व्यवस्था है। माने बराबरी है। लेकिन, भारत की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जी डिं पी आय सिर्फ 2900 डॉलर माने 246500 रुपए है, दूसरी ओर जापान की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष आय 34000 डॉलर माने 2890000 रुपए है, माने जापान की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष आय भारत से बारह गुना अधिक है। यह क्या चक्कर है? यह चक्कर पाश्चात्य अर्थ शास्त्र में होने वाले दोषों का है।
इसलिए साथियों, इस पाश्चात्य शोषणकारी पूंजीवाद केंद्रित अर्थ शास्त्र में बहुत ज्यादा अंतर्विरोध हैं। यह पाश्चात्य अर्थ शास्त्र का रथ शोषण और भ्रष्टाचार इन दो पहियों पर दौड़ता है। जब तक भारत इस पाश्चात्य अर्थ शास्त्र को जारी रखेगा, तब तक भारत में शोषण और भ्रष्टाचार खुले आम चलता रहेगा, चाहे आप शोषण और भ्रष्टाचार के विरोध में कितने भी लंबे विद्वता पूर्वक भाषण दे या प्रसार माध्यमों में बड़े बड़े विद्वत्ता दर्शक लेख लिखे। हम उस पाश्चात्य अर्थ शास्त्र के भरोसे नहीं रह सकते है।
चीन दुनिया की नंबर दो की माने 19.231 लाख करोड़ डॉलर 1650 लाख करोड़ रुपए की अर्थ व्यवस्था है, जो भारत के अर्थ व्यवस्था से पांच गुना बड़ी है। इस का कारण है, चीन ने अमेरिका का और यूरोप का पूंजी निवेश चीन में खींच कर लाया, पूंजी निवेशकों को चीन में पूंजी निवेश करने के लिए बाध्य किया, इसके लिए आवश्यक पायाभूत सुविधाएं basic inftrastructure खड़ी की, देश के बौद्धिक संपदा का सम्मान किया, उस का अधिकाधिक उपयोग देश में किया, मूलभूत अनुसंधान fundamental research को बहुत ज्यादा महत्व दिया, उसके लिए अधिकाधिक राशि उपलब्ध की, अधिकाधिक वस्तुओं के निर्माण के लिए जो भी करना चाहिए था वह किया, वस्तुओं का लागत मूल्य घटाया, उसके बल पर पूरे दुनिया का बाजार अपने मुट्ठी के समेटा, चीन ने दूसरे देशों से सस्ता माल आयात करके ऊंचे दामों पर बेचने का और देश के युवा मानवी संसाधनों को बेकारी के खाई में ढकेलने वाला केवल बेपार नहीं किया, सिर्फ बेपारी बनने के जगह पर उद्योगों का विशाल जाल खड़ा किया, बेरोजगारों को रोजगार दिया, उनके मानवी हूनर skill का सदुपयोग किया। परिणाम? आज चीन अमेरिका के बाद दुनिया की नंबर दो की आर्थिक महासत्ता बन गई है और अमेरिका के आंखों में आंखे डालकर बराबरी से बात कर रहा हैं।
आज उसी चीन ने भारत को रासायनिक खाद निर्यात करने पर रोक लगा दी है। भारत चीन से अपने कुल आवश्यकता का 80 प्रतिशत खाद आयात कर रहा हैं, भारत खाद के संदर्भ में पूरा चीन पर निर्भर हो गया हैं, परिणाम स्वरूप देश के किसानों में खाद न मिलने से असंतोष के लक्षण उभर रहे है। आज भारत हर साल 150 लाख मैट्रिक टन खाद्य तेल आयात कर रहा हैं, 67 लाख टन दाले pulses आयात कर रहा हैं, लाखों टन फल आयात कर रहा हैं, लाखों टन सूखा मेवा आयात कर रहा है, लाखों टन मसाले पदार्थ आयात कर रहा हैं। इतना ही नहीं भारत हर साल लाखों टन खाद , बीज, जन्नुक अभियांत्रिकी तकनीक आयात कर रहा हैं। हरित क्रांति वास्तव में क्रांति नहीं हैं, भ्रांति है, एक ऐसा चक्रव्यूह है जो भारत के अर्थ व्यवस्था को और सजीव सृष्टि को विनाश के कगार पर खड़ा कर रहा हैं ।
अगर संपूर्ण शतप्रतिशत स्वदेशी वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध हुए सुभाष पालेकर कृषि में कोई भी विदेशी हो या स्वदेशी खतरनाक विनाशकारी परावलंबी रासायनिक खाद, गोबर खाद, कंपोस्ट खाद, बर्मी कंपोस्ट, कोई भी मानव निर्मित खाद डालना ही नहीं है, तो खाद बाहर से आयात करने का सवाल ही कहा पैदा होता हैं ? इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
देश को आर्थिक संकट से बचाना है, दुनिया के दादा लोगों से बचना है, तो असल न्यूनतम लागत मूल्य की लेकिन सुभाष पालेकर कृषि से पैदा संपूर्ण स्वदेशी अधिक सर्वोत्तम दर्जा के जहर मुक्त पोषण मूल्यों से समृद्ध औषधि अल्क धर्मी कृषि उपज और प्रक्रियाकृत खाद्य पदार्थों की पूरे दुनिया में अधिकाधिक निर्यात करना और न्यूनतम आयात पर निर्भर रहना।
क्योंकि पूरे दुनिया में कोई भी वैश्विक नागरिक कर्क रोग cancer, मधुमेह daibetes, उच्च रक्त चाप high blood pressure, दिल की बीमारियां heart disease, क्षय Tuber culosis, अस्थि छेद osteo porosis, श्वसन व्यवस्था की बीमारीया respiratory disorders, और पेट की बीमारियां intestinal cancer से मरना नहीं चाहता हैं, वह किसी भी हालत में जिंदा रहना चाहता हैं, इसके लिए वह जहर मुक्त ग्लूटेन मुक्त पोषण मूल्यों से समृद्ध औषधि तंतु मय पदार्थों से समृद्ध fibre saturated अल्क धर्मी alkaline भोजन मांगता है, जो सिर्फ सुभाष पालेकर कृषि तकनीक ही दे सकता हैं, जो सुभाष पालेकर कृषि वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को रोकता है, भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है। उल्टा शत प्रतिशत विदेशी रासायनिक खेती से पैदा, विदेशी गो आधारित खेती से पैदा, विदेशी जैविक खेती से पैदा खाद्य जहरीला होता हैं, ये तीनों वैश्विक तापमान वृद्धि एवं जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है, भूमि की उर्वरा शक्ति का नाश करती है।
अब समय आया है कि भारत सभी प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं, अमेरिका और यूरोप नहीं , उस स्थिति का लाभ हम संपूर्ण स्वदेशी से कैसे उठाते है, यह निश्चित करने का संवैधानिक दायित्व नीती निर्धारकों का हैं, आशा है कुछ जरूर बदलाव आएगा। धन्यवाद।
इस पोस्ट को सर्वत्र हस्तांतरित forward कीजियेगा यह विनम्र अनुरोध हैं।
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