राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन का निर्णय परम अभिनंदनीय ऐतिहासिक

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर 

ता 1 दिसंबर 2024 रविवार 

साथियों और बहनों,

सुभाष पालेकर कृषि का पूरे भारत मे अमल करने के लिए प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार द्वारा ता 25 नवंबर 2024 को गठित इस राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन का निर्णय परम अभिनंदनीय ऐतिहासिक निर्णय है , भारत सरकारको हार्दिक मनपूर्वक शुभकामनाएं। 

इस के अमल में कूल 2480 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान किया गया है, जिसमें भारत सरकार का हिस्सा 1584 करोड़ रुपए और 897 करोड़ रुपए राज्य सरकार का हिस्सा रहेगा। 

इस मिशन ( अभियान) में पूरे देश में ग्राम पंचायतों के कूल 1500 समूह ( clusters) गठित किए जाएंगे,जिनके द्वारा एक करोड़ किसानों तक सुभाष पालेकर कृषि को पहुंचाया जाएगा, जिसका लाभ कूल 7.5 लाख हेक्टर भूमि को होगा। 

        इस मिशन में जो प्राकृतिक खेती नाम दिया है, उस नाम से देश जरूर भ्रमित होगा, गुमराह होगा। क्योंकि, प्राकृतिक खेती नाम का कृषि तकनीक पूरी दुनिया में कही भी अस्तित्व में नहीं हैं, अगर हैं तो दिखाइए, कहा है?

 देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने कभी भी सिर्फ प्राकृतिक खेती शब्द का उच्चारण नहीं किया, हर बार उन्होंने अपने जाहिर भाषणों में पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी की प्राकृतिक खेती इस नाम से सुस्पष्ट उल्लेख किया। फिर यह सिर्फ प्राकृतिक खेती नाम कहा से आया है?

 अगर पूरे दुनिया में प्राकृतिक खेती नाम का कोई भी कृषि तकनीक अस्तित्व में ही नहीं है, तब यह नाम सौ प्रतिशत झूठ है, असत्य है, और संविधान असत्य बोलनेकी अनुमति नहीं देता, इसलिए वह नाम असंवैधानिक भी है। कैसे ? हम वैज्ञानिक अध्यात्मिक कसौटियों पर समीक्षात्मक विश्लेषण करेंगे।

       पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी के द्वारा खोजी कृषि तकनीक का अधिकृत सर्व मान्य नाम हैं ... सुभाष पालेकर कृषि SPK. जिसमें उनके द्वारा अनुसंधानित खोज साधन हैं... बीजामृत, घन जीवामृत, द्रव जीवामृत, आच्छादन , वाफ़सा और सह फसलों की अधिकतम विविधता। अब उस नाम को जबरन बदलकर उसे प्राकृतिक खेती कहा जा रहा हैं। 

      प्राकृतिक खेती माने जो प्रकृति में अस्तित्व में है वह प्राकृतिक। अर्थात,जो प्रकृति में अस्तित्व में नहीं हैं, वह प्राकृतिक नहीं हैं। प्रकृति माने घने जंगल। जो जो साधन सुभाष पालेकर कृषि में और अन्य सभी कृषि पद्धतियों में उपयोग में लाए जा रहे है, उनका अस्तित्व अगर प्रकृति में है, तब जरूर हम प्राकृतिक कहेंगे। लेकिन, वास्तविकता यह है कि उन संसाधनों में से एक भी साधन प्राकृतिमे अस्तित्व में नहीं हैं। 

      सुभाष पालेकर कृषि में और अन्य सभी प्रचलीत कृषि पद्धतियों में भूमि की जोताई गुड़ाई निराई है,बीज बोआई है,पौध रोपाई है, मानवी सिंचाई हैं, वनस्पतिजन्य कीट एवं रोग प्रतिरोधक दवाओं का छिड़काव के रूप में उपयोग है, फसल कटाई है, जंगली जानवरों से फसलों को बचाने हेतु कंटेली लोहे के तारो की बाड है, और फसल उपज का मानवी उपयोग है। 

         लेकिन, प्रकृति में जोताई गुड़ाई निराई अस्तित्व में नहीं हैं, बीज बोआई या पौध रोपाई अस्तित्व में नहीं हैं, मानवी सिंचाई अस्तित्व में नहीं हैं, दवाओं का या जीवामृत का खड़ी फसल पर कोई भी छिड़काव अस्तित्व में नहीं है, फसल कटाई अस्तित्व में नहीं हैं, जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए कोई भी मानवी कंटीली तारों की बाड अस्तित्व में नहीं है, और जंगल के उपज का मानवी भोजन में उपयोग नहीं हैं। 

   अर्थात, जो जो साधन सुभाष पालेकर कृषि में उपयोग में लाए जा रहे है ,उन सभी का अस्तित्व ही प्रकृति में नहीं हैं, तो फिर सुभाष पालेकर कृषि वास्तव में प्राकृतिक खेती नहीं है यह वैज्ञानिक अध्यात्मिक नैतीक सत्यार्थी कसौटियों पर सिद्ध होता है।

 इसका सुस्पष्ट अर्थ है कि, सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहना पुरी तरह गलत हैं झूठ है असत्य है और असंवैधानिक है। इससे यह सिद्ध होता है कि सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहकर देश को सरेआम गुमराह किया जा रहा है।

      जापान के मासानोंबु फुकुओका की खेती को भी प्राकृतिक खेती कहा जाता है, वास्तव मे वह प्राकृतिक खेती है नहीं। क्यों कि मासानोबू फुकुओका अपने संतरे के बगीचे में खाद के लिए बड़े पैमाने पर मुर्गी पालन करते थे, प्रकृति में मुर्गी पालन अस्तित्व में नहीं हैं। 

डॉ मासानोबू फुकुओका और मै श्री भास्कर सावे गुरुजी के घर में दो दिन एकसाथ चर्चा के लिए बैठे थे। अर्थात उन्हें मै जितना जानता हूं,ये नाम बदलने वाले मित्र नहीं जानते है। 

स्व श्री भास्कर सावे गुरुजी भी अपने चीकू के बगीचे में पड़ोसी पेनिसिलिन दवा निर्माण कारखाने का तमाम कूड़ा आच्छादन के रूप में डालते थे और उनके गेहूं के फसल में गोबर खाद का उपयोग करते थे, और अपने इस पद्धति को वे भी प्राकृतिक खेती नाम देते थे। श्री भास्कर सावे गुरुजी मेरे अभिन्न मित्र थे ,मैं उनके गांव में उनके घर चार दिन दो बार रहा हूं, पुणे में जब मैं विख्यात कृषि पत्रिका बलीराजा का संपादक था तब सावे गुरुजी और मै पुणे में कई बार विस्तार से चर्चा करते थे। उनकी खेती मैने देखी है, मैं उन्हें इन लोगों से ज्यादा गहराई से जानता हूं । 

प्रकृति में पेनिसिलिन दवा निर्माण कारखाने के कूड़े का उपयोग और गोबर खाद का उपयोग अस्तित्व में नहीं हैं। तब फिर श्री भास्कर सावे गुरुजी की खेती प्राकृतिक कैसे होती हैं? वह वास्तव मे प्राकृतिक खेती है नहीं। 

      पंच गव्य अग्निहोत्र का उपयोग बताने वाले वैदिक खेती वाले भी उसे प्राकृतिक खेती ही कहते है। लेकिन, प्रकृति में पंच गव्य अग्निहोत्र का अस्तित्व ही नहीं है, तो प्राकृतिक कैसे होती हैं, अर्थात वह प्राकृतिक नहीं हैं। 

आजकल सुभाष पालेकर कृषि को भारत सरकार द्वारा स्वीकृत किए जाने पर कंपोस्ट खाद, कैंचवा खाद vermi compost, बायो डायनेमिक खेती का प्रचार करने वाले जैविक खेती organic farming के प्रचारक भी जैविक खेती को प्राकृतिक खेती कहने लगे है। 

लेकिन, प्रकृति में कंपोस्ट खाद, कैंचवा खाद, बायो डायनेमिक खाद का बिलकुल अस्तित्व ही नहीं हैं। अर्थात ये कृषि पद्धतियां प्राकृतिक खेती नहीं है।

     सरकार का सुभाष पालेकर कृषि के प्रति रुझान देखकर अब परांपरागत गोबर खाद के उपयोग पर आधारित गो आधारित खेती के कड़े प्रचारक उसे गोबर खाद को भी प्राकृतिक खेती कहने लगे है। प्रकृति में गोबर खाद का उपयोग अस्तित्व में ही नहीं है, माने गो आधारित खेती वास्तव मे प्राकृतिक खेती नहीं है।

     अब सवाल खड़ा होता है, धर्म संकट खड़ा होता है कि जब ये लोग सुभाष पालेकर कृषि इस नाम को हटाकर जबरन उसे सिर्फ प्राकृतिक खेती कहने लगे हैं, तो सवाल खड़ा होता हैं कि कौनसी प्राकृतिक खेती? मासानोबू फुकुओका की प्राकृतिक खेती, या भास्कर सावे गुरुजी की प्राकृतिक खेती, या पंच गव्य अग्निहोत्र का प्रचार करने वालों की प्राकृतिक खेती, या बायो डायनेमिक वाले की प्राकृतिक खेती या गो आधारित खेती वालों कि प्राकृतिक खेती या सुभाष पालेकर कृषि वाली नाम बदली प्राकृतिक खेती ? देश के तमाम किसान, जनता, वैज्ञानिक ,राजनीतिक ,गैर सरकारी संगठन ,सरकारी कृषि प्रशासन इस प्राकृतिक खेती नाम से भ्रमित हो रहे है, गुमराह हो रहे है, सर्वत्र अफरातफरी का माहौल बन गया है, कोई भी सुस्पष्टता नहीं हैं। क्यों इस तरह देश को गुमराह किया जा रहा है? यह सब देश के हित में नहीं हैं।

      इसलिए, मेरी भारत सरकार को विनम्रतापूर्वक प्रार्थना है कि मेरी कृषि विधि को प्राकृतिक खेती कहना कृपया बंद कीजियेगा, उसे मूल नाम सुभाष पालेकर कृषि के रूप मे प्रचारित कीजियेगा, और इस भयावह भ्रम को बंद कीजियेगा।

         जनता के और किसानो के हित की सरकार की योजनाएं सरकार बनाती है, उन योजनाओं का सम्पूर्ण लाभ लाभार्थियों को मिलने के लिए उन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए गैर सरकारी संगठनों की यां सामाजिक संस्थाओं की मदद ली जाती हैं, ताकि योजनाओं के कार्यान्वयन प्रक्रिया में कोई स्वार्थी दलाल या भ्रष्ट लोगों का प्रवेश न हो।

      भारत सरकार के द्वारा किसानों के हित के लिए देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी के इच्छा से सुभाष पालेकर कृषि को नीती बनाया, जिसे भारत सरकार प्राकृतिक खेती यह नाम से पुकारती है, साथ में अधिकतम उत्पादक किसान स्वयं सामूहिक स्तर पर उनके कृषि उपज पर व्यक्तिगत या सामूहिक प्रक्रिया करके अपने कृषि उपज की मूल्य वृध्दि value addition करके उसे सीधे शहरी उपभोक्ताओं को बेचने की व्यवस्था खड़ी करने के लिए भारत सरकार ने फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनिया खोलने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया, महिलाओं को सक्षम बनाने के लिए सखी मंडल के गठन का और उन्हें प्रशिक्षित करने का बहुत ही प्रभावशाली उपक्रमशीलता अभियान शुरू किया , इसके लिए सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन भारत सरकार का हार्दिक अभिनंदन करता है।

    हमारे सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन के किसान उस अभियान में सरकार को सक्रीय मदद भी कर रहे है,अपनी निशुल्क सेवा दे रहे हैं, जो कि हमारे सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन का सैद्धांतिक मूल्य है,ताकि  योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता रहे, और आगे भी हम सरकार को और समाज को हमारी निशुल्क सेवा देते रहेंगे।

       किसी भी सरकार ने जब भी मुझे शिबीर मांगे हैं, मैने मेरी निशुल्क सेवा उन्हें दी है, जिसके परिणाम स्वरुप, देश के इतिहास में पहली बार देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने मेरी सौ प्रतिशत स्वदेशी भारतीय सुभाष पालेकर कृषि के खोज को सम्मानित करने के लिए मुझ जैसे किसान को सन 2016  में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया। इसके पहले किसान को देश के श्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया। 

     लेकिन, मेरा मानना एवं आग्रह है कि सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में सौ प्रतिशत पारदर्शिता और लाभार्थियों को सौ प्रतिशत लाभ मिलने के लिए, देश के ऐसे दसवीं पास या बारहवीं कक्षा पास युवा शक्ति का अन्तर्भाव करना चाहिए, जो रचनात्मक सर्जन शील अहिंसक संवैधानिक अध्यात्मिक समाधान देने में ही अपनी श्रद्धा विश्वास निष्ठा रखते है , कम शिक्षित होने से उन्हें कोई भी नौकरी मिलने की संभावना बिलकुल नहीं हैं, लेकिन नव निर्माण में झोंक देने की अदम्य साहस और इच्छा उनमें होती हैं और यह युवा शक्ति इस दिशा में सहयोग देने हेतू जन आन्दोलन के माध्यम से सरकार से जुड़ना चाहती है। 

इससे रोजगार नौकरी न मिलने से निराश लेकिन समर्पित बेरोजगार युवा शक्ति को एक नव निर्माण का सुयोग्य समर्थ मंच मिल जाएगा, परिणाम स्वरुप, वह युवा शक्ति नशा हिंसा व्यभिचार आत्महत्या और तोड़फोड़ के पूर्व निर्धारित षड्यंत्र कारी चक्रव्यूह से दूर रहेंगी और देश को प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के रचनात्मक सर्जन शील अहिंसक संवैधानिक अभियान में जुट जाएगी। 

       उच्च शिक्षित युवा शक्ति के हाथों में विश्व विद्यालय की पदवी माने डिग्री है, लेकिन उनके पास कोई हूनर कौशल skill न होने से नौकरी मिलने के लिए उन डिग्रीयो का महत्व मिट्टी मोल बनता हैं। डिग्री है लेकिन नौकरी नहीं, नोकरी नहीं तो शादी नही, भूमि है लेकिन रासायनिक खेती या जैविक खेती में घाटा ही घाटा है, अंत में आत्महत्या या गांव छोड़कर पलायन, ये दो विकल्प उनके सामने बचते है। 

       हम हमारे सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन के माध्यम से शतप्रतिशत स्वदेशी भारतीय एक एकड़ पालेकर फूड फॉरेस्ट पंच स्तरीय मॉडल के रूप में कोई भी किसान परिवार अपने दस प्रतिशत सिंचाई के पानी के उपलब्धता में एक देशी गोमाता का उपयोग करके और देशी बीजों का उपयोग करके न्यनूतम लागत मूल्य में उस मॉडल में दुनिया में उपस्थित सभी फसलों कों उगाकर पारिवारिक भोजन आत्मनिर्भरता एवं पारिवारिक आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु उन्हें मेरे सौ प्रतिशत स्वदेशी शिबीरो के माध्यम से हम प्रशिक्षित कर रहे है और उन्हें वे मॉडल प्रत्यक्ष दिखाने के लिए कृषि पर्यटन यात्रा माने शिवार फेरी का आयोजन देश भर सर्वत्र निरंतर कर रहे है।

        1) वैश्विक तापमान वृद्धि global warming और जल वायु परिवर्तन climate change 2) एवं नकली बुद्धिमता artificial intelligence , 3) ईश्वर के द्वारा निर्मित सु नियंत्रीत, सु व्यवस्थित, स्वयं विकसित, स्वयं पोषित एवं सम्पूर्ण स्वावलंबी ब्रह्माण्ड का संचालन करने वाली महा व्यवस्था के बारे मे मानव का होने वाला महा अज्ञान और 4)  बौद्धिक आतंक बाद ये चार मानव द्वारा निर्मित भस्मासुर निकट भविष्य में सभी सजीव सृष्टि को नाश के तरफ तेजी से ले जा रहे हैं । 

उस विनाश को रोकने का सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन के माध्यम से हमारे पास होने वाले सीमित संसाधनों से हम सौ प्रतिशत प्रामाणिक एवं पारदर्शी पूरी तरह समर्पित भाव से प्रयास कर रहे है। क्या हम गलत काम कर रहे है ?

 क्या हमारा यह निशुल्क सेवा देना असंवैधानिक है ? अगर नहीं हैं तब फिर यह हमारा विरोध क्यों किया जा रहा है ? सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती का गलत भ्रमित नाम देकर देश को सरेआम गुमराह क्यों किया जा रहा है?

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