लुप्त हो रही प्राचीन भारतीय गुरू शिष्य परंपरा की याद
पदमश्री डॉ सुभाष पालेकर
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ता 5 सितंबर 2024 शिक्षक दिन
अभी लुप्त हो रही प्राचीन भारतीय गुरू शिष्य परंपरा की याद दिलाने वाले शिक्षक दिन की बधाईयां। जो सत्य ही बोलता है,सत्य के पीछे पहाड़ जैसा खड़ा होकर सत्याग्रह करता है, जो सत्य ही पढ़ाता है वह शिक्षक होता है । जो सत्य के नाम पर असत्य,ज्ञान के नाम पर अज्ञान, विज्ञान के नाम पर अविज्ञान पढ़ाता है, बौद्धिक अहिंसा के नाम पर बौद्धिक हिंसा रूपी बौद्धिक आतंकवाद intellectual extremism फैलाता है,वह शिक्षक कैसे हो सकता है? हरित क्रांति के सेनापति कृषि वैज्ञानिक जब सौ प्रतिशत झूठा दावा करते हैं की कोई भी खाद फसलों के जड़ोंका भोजन होता है, तब वे शिक्षक कैसे हो सकते हैं? क्योंकि मैंने वैज्ञानिक कसोंटियों पर सिद्ध किया है की कोई भी मानव निर्मित खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं है, ईश्वर निर्मित स्वयं विकासी स्वयं पोषी स्वावलंबी व्यवस्था के माध्यम से मानव के किसी भी सहायता के बिना किसी भी पेड़ पौधे को जड़े अपना भोजन भूमि में होने वाले अनंत करोड़ सुक्ष्म जीवाणु संपृक्ति के द्वारा खुद पकाती है और खुद अपने शरीर को वृद्धि विकास करती है। हमारे खड़े सुभाष पालेकर कृषि के मॉडल प्रारूप खेत आपको मेरे इस सिद्धांत की प्रचिति देते है।
शोषण और भ्रष्टाचार इन दो पहियों पर चलने वाले पाश्चात्य पूंजीवाद केंद्रित राजनीतिक विचार धाराएं जब सामाजिक दायित्व के माध्यम से शोषण मुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त समाज की बात करती है, तब वे सौ प्रतिशत झूठ बोलकर दुनिया को गुमराह करती है। अपने शिष्यों को यह झूठी विचार धारा पढ़ाने वाले शिक्षक वास्तव में शिक्षक कैसे हो सकते हैं?
मुंह से देशी गो वंश पालन करने का और देशी गोमाता का दूध मानवी स्वास्थ्य के लिए अमृत है,इसलिए देशी गो पालन ही करना है, विदेशी गो वंश को पालना नहीं है , विदेशी गाय का दूध मानवी स्वास्थ्य के लिए अहितकारक होता है ऐसा पाठ अपने भाषण में पढ़ाने वाले उच्च पदस्थ व्यक्ति जब अपने खुद के संस्था के गोशाला में सैंकड़ों विदेशी गाय को पालते हैं और विदेशी गाय का दूध मिठाइयां विद्यार्थियों को रोज पिलाते है, तब वे उनका शिक्षक होने का, इस विषय पर भाषण देने का नैतिक अधिकार पूरी तरह खो देते है, तब वे किस अधिकार से सुभाष पालेकर कृषि का प्रचारक होने का दावा करते हैं? किस नैतिक अधिकार से खुद को शिक्षक होने का दावा करते हैं?
जिसमे बीजामृत जीवामृत घन जीवामृत आच्छादन वाफसा जैव विविधता, जोताई, बीज बोआई, रोपाई , निराई गुड़ाई,सिंचाई , फसल कटाई , जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा हेतु बाड़, प्रक्रिया बिक्री आदि कृषि साधनो का उपयोग होता है,उस पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी द्वारा खोजे गए कृषि तंत्र तकनीक को सुभाष पालेकर कृषि कहते है, दुनिया इस सत्य को जानती है। लेकिन, जब कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति इन साधनोका प्रचार करते हुए उस तकनीक का जनक के द्वारा रखा मूल नाम सुभाष पालेकर कृषि को हटा देता है, और उसके जगह पर जो दुनियां में कही भी अस्तित्व में नहीं हैं उस प्राकृतिक खेती या गो आधारित प्राकृतिक खेती नाम रखता है, माने सौ प्रतिशत झूठ बोलकर देश दुनिया को गुमराह करता है, तब वह अपना शिक्षक होने का नैतिक अधिकार पूरी तरह खो देता है। किस अधिकार से वे खुद को बीजामृत जीवामृत घन जीवामृत आच्छादन वाफसा इन मेरे तंत्र के प्रचारक बन बैठे है ?
कोई भी उच्च पदस्थ व्यक्ति अपने पास होने वाले असंवैधानिक प्रशासकीय या आर्थिक प्रभाव से सत्य को कुछ काल तक दबाकर रख सकता हैं, लेकिन सदा के लिए नहीं। एक दिन सत्य सारे बंधन शृंखला को तोड़कर खुद अपने आप बाहर निकल आकर दुनिया के सामने एक खुली नग्न वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत हो जाता हैं। सुभाष पालेकर कृषि का वास्तविक सत्यार्थी नाम बदलकर उसे असत्य झुठी अस्तित्व विहिन छल रूपी प्राकृतिक खेती या गो आधारित प्राकृतिक खेती कहने वाले किसान विरोधी उच्च पदस्थ तत्व कुछ समय तक देश को भ्रमित करने में जरूर सफल हुए है, लेकिन, अब देश को उन का यह झूठा असत्य षडयंत्र समझ में आ गया है, परिणाम स्वरुप वे लोग अब दुनिया के सामने अपने मूल छली रूप में अपनेआप प्रगट हो रहे हैं, वैसे वैसे उनका मूल असली चेहरा देश के सामने आ रहा है। लोग अब उनके इस असंवैधानिक छल कपट को पहछान गए हैं।
सत्य की हार नहीं होती,दुनिया की कोई भी ताकत सत्य को सदा के लिए हरा नहीं सकती । असत्य बोलने के कुछ तात्कालिक फायदे जरूर मिलते हैं,लेकिन दीर्घ कालीन नुकसान बहुत गहरा होता है।तात्कालिक लाभ के लालच में बहकर अपना भविष्य कालीन चरित्र बरबाद करने वाले मित्रों को मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कृपया झूठ बोलना छोड़ दीजिए, सत्यवादी बने,सत्याग्रही बने और मानवी समस्याओं का शाश्वत समाधान देने के हमारे जन आन्दोलन में दोबारा प्रवेश करे। क्योंकि,सत्य ही मानव के अस्तित्व का मूलाधार होता है।
निरंतर सत्य बोलने से और असत्य का ठोस विरोध करने से ईश्वर हमे वाचा सिद्धी प्राप्त करके देता हैं, उसका गहरा प्रभाव समाज पर पड़ता है, लोग उन पर अगाध श्रद्धा विश्वास करने लगते है, आपके पीछे खड़े हो जाते हैं। लेकिन, भ्रष्ट आचार से आर्थिक कमाई करने हेतु या भ्रष्ट मार्ग से सत्ता पद प्राप्ति हेतु जो लोग निरंतर झूठ बोलते जाते है, पहला झूठ छिपाने के लिए और दूसरा झूठ, इस तरह झूठ असत्य वचन बोलने की लत लग जाती है तब उन झुठे छल असत्य बोलने वालो की वाचा सिद्धी को ईश्वर वापिस खींच लेता है, परिणाम स्वरुप आप की वाचा सिद्धी लुप्त हो जाती हैं, तब आप पर घर के लोग और समाज बिलकुल विश्वास नहीं करता , आप समाज से अलग थलग पड़ जाते है, और मूल सामाजिक बहाव से सदा के लिए बहिष्कृत हो जाते है। .... सुभाष पालेकर कृषि रूपी सत्य को कितना भी दबाकर रखो, सदा के लिए उसे दबाकर रखना केवल असंभव है। आखिर में अंतिम जीत सत्य की ही होती है।
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