पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर की बात

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर 

ता 25 अगस्त 2024 रविवार 

साथियों और बहनों,

जिस कृषि पद्धति में बीजामृत जीवामृत घन जीवामृत आच्छादन वाफसा और सह फसलों की एवम मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणु की जैव विविधता इन सभी पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी द्वारा खोजे गए कृषि साधनों का उपयोग होता है, उस कृषि पद्धति को.......सुभाष पालेकर कृषि .....नाम से पुरे दुनिया में पहछानी जाती है। 

      लेकिन कुछ लोग इस सुभाष पालेकर कृषि को अज्ञानवश अथवा जानबूझकर... प्राकृतिक खेती ( नैसर्गिक शेती natural farming) ...नाम से प्रचारित 

कर रहे हैं। सवाल खडा होता है की क्या सुभाष पालेकर कृषि वास्तव में प्राकृतिक खेती है ? इस सवाल का जवाब हम वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर दें रहे है। 

       प्राकृतिक खेती की सही परिभाषा है.... जो जो प्रकृति में अस्तित्व में है वह प्राकृतिक खेती है। Which is existed in the Nature that is natural . अर्थात ,जो जो प्रकृति में बिलकुल अस्तित्व में नहीं हैं,वह प्राकृतिक कैसे हो सकती हैं? माने वह अप्राकृतिक है। प्रकृति माने ईश्वर द्वारा निर्मित घने जंगल। 

सुभाष पालेकर कृषि में...भूमि की जोताई soil cultivation हैं, बीज बोआई है, पौध रोपाई seedling transplantation है, निराई weeding निंदन गुड़ाई hoeing कोळपणी माने मानवद्वारा खरपतवारो का नियन्त्रण है, मानवी सिंचाई है, वनस्पती जन्य दवाओं का एवम जीवामृत का खड़ी फसल पर मानव द्वारा किया जानेवाला छिंडकाव spray है,फसल कटाई है, खेत की फसल की भटके प्राणीयो के द्वारा होने वाली हानि को टालने के लिए कंटैले तार की बाड़ fencing हैं, और कृषि उपज की प्रक्रिया एवम बिक्री है।

      लेकिन, घने जंगल रूपी ईश्वर निर्मित प्रकृति में सुभाष पालेकर कृषि में उप्पर लिखे जो जो भी कृषि कार्य किए जा रहे हैं, उनमें से किसी भी कृषि कार्य का अस्तित्व बिलकुल नहीं हैं। 

अगर है तो दिखाइए, आपको खुला चैलेंज आवाहन है।

        घने जंगल रूपी ईश्वर निर्मित प्रकृति में भूमि की जोताई नही हैं, बीज बोआई एवम पौध रोपाई नहीं है, खरपतवारो के नियंत्रण के लिए निराई गुड़ाई माने अन्तर जोताई नही है, मानवी सिंचाई नही हैं, दवाओं का और  जीवामृत का खड़ी फसल पर मानव द्वारा छिड़कांव नही है, फसल कटाई नहीं है, कृषि उपज पर प्रक्रिया नहीं हैं, कृषि उपज की बिक्री नहीं हैं, भटके प्राणियों से फसल की हो रही हानि को टालने के लिए कोई भी मानवी कंटैल बाड़ fencing नही हैं। 

अगर सुभाष पालेकर कृषि में जो जो कृषि कार्य किए जाते हैं, उनमें से किसी भी कृषि कार्य का अस्तित्व प्रकृति में बिलकुल नहीं हैं, फिर सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती नाम से क्यों प्रचारित किया जा रहा हैं,किस अधिकार से प्रचारित किया जा रहा हैं ? 

किस सैंवैधानिक आधार पर किया जा रहा है? किन मानवी नैतिक मूल्यों पर प्रचार किया जा रहा हैं?

     इस सौ प्रतिशत सत्य को स्वीकारना हर भारतीय का संविधानिक दायित्व बनता है की आप अपने अंतरात्मा को सवाल करके पूछिए की सुभाष पालेकर कृषि वास्तव मैं प्राकृतिक खेती ( नैसर्गिक शेती) कैसे हो सकती हैं? 

इस का जवाब कोई भी समझदार व्यक्ती अपने अंतरात्मा से आई आवाज बताएगा की सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहना गलत है, झूठ है, असत्य है ,कहने वाला झूठ बोल कर अज्ञानवश अथवा जानबूझकर स्वयं को गुमराह कर रहा है और देश को भी गुमराह कर रहा है। 

यहां मैं एक सत्य को आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं की हमारे देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कई बार किसानों के खुलें सभाओं में कहा है की भारत सरकार पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी के प्राकृतिक खेती का प्रचार करेगी। वे पूरे समर्पित भाव से सुभाष पालेकर कृषि को देश में प्रचारित करना चाहते है। 

मेरे कृषि अनुसन्धान का तत्कालीन नीती आयोग के उपाध्यक्ष माननीय श्री राजीव कुमार जी के नेतृत्व में तुलनात्मक अभ्यास किया, अंत में उसे भारत सरकार के नीती में अंतर्भूत किया, उसी मेरे तकनिक को उचित न्याय देने हेतु देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने मुझे देश के चौथे सर्वोच्च पुरस्कार पद्मश्री देकर सम्मानित किया, भारत के इतिहास में पहली बार मुझ जैसे किसान को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है ।

    मैने चौबीस साल अनुसंधानात्मक गहन तपस्या करके ,उस महंगे अनुसंधान कार्य को जारी रखने के लिए मेरी सोने जैसी जमीन को बेंचा,पत्नी के गहने बेंचे, समाज से, रिश्तेदारों से मित्रो से मुझे पागल समझकर बहिष्कृत हुआ, निरंतर अपमान सहे,ईश्वर ने मेरी कड़ी परीक्षा ली, लेकिन चौबीस साल तक मैंने अनुसंधान जारी रखा, मन में निरंतर आने वाले आत्महत्या के प्रबल विचारों को दूर रखा,आखिर में ईश्वर द्वारा ली मेरी चौबीस साल की घोर परीक्षा में मुझे ईश्वर द्वारा पास किया गया, अंतमे मेरे हाथों में जो दर्शन और तकनिक आया ,उसे मैने शुरू में नाम दीया ... झीरो बजेट खेती।

लेकिन बाद में मुझे मालूम पड़ा कि Zero Budget हो ही नहीं सकता, तब मैंने नाम बदलकर नया नाम रखा ...सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती। 

      लेकिन आगे आगे मुझे मालूम पड़ा कि प्राकृतिक खेती का दुनिया में कही भी अस्तित्व नहीं हैं, क्यों की वह संभव नही है,तब मैंने अंत में वह नाम बदलकर नया नाम रखा .... सुभाष पालेकर कृषि। इस नाम में मेरा सुभाष पालेकर नाम क्यों मैने क्यों अंतर्भुत किया ? आपके मन में यह सवाल जरूर पैदा हुआ है,मुझे मालूम है। उसका भी मैं सत्यार्थी जवाब दे रहा हूं।

        क्योंकी, बाद में मुझे मालूम पड़ा कि जो पहले अपने संस्था के खेतीमे रसायनिक खेती कर रहे थे ,उस में घाटा आने लगा,तो आगे जैविक खेती organic farming करने लगे, उसमे घाटा बढ़ा और पैदावार और घटने लगी, तब वे रासायनिक खेती और जैविक खेती का ऐसा विकल्प ढूंढने लगे,जिसमे घाटा न हो ,उपज न घटे, लागत का मूल्य न्यूनतम हो,तब उन्हे किसीने मेरे तकनिक के बारे में बताया,तब उन्होंने मुझे संपर्क किया, मुझे मेरा शिबीर मांगा, मैने पांच दिनका शिबीर उनके संस्था में दिया,उन्होंने पांच दिन सामने बैठकर मेरा दर्शन तकनीक सुना, पसंत आया, संस्था के खेती में मेरे तकनिक को अमल में लाया,परिणाम बढ़िया मिले, तब वे मेरे साथ मेरे परम शिष्य के रूप में जुड़ गए, पूरे समर्पण भाव से पुरे देश में सुभाष पालेकर कृषि के प्रचार में लग गए। उनको मैं बहुत मानता हूं , आज भी मेरे अंतरात्मा में उनकी प्रतिमा अंकित है। 

लेकिन ,मेरे ही साथ मेरे परम शिष्य बनकर मेरे साथ प्रचार में लगे कुछ सांवैधानिक दायित्व संभालने वाले मित्र,मेरे ही बीजामृत जीवामृत घन जीवामृत आच्छादन वाफसा फसलों की विविधता इन सभी मेरे द्वारा खोजे साधनों को किसानों को बता रहे है, लेकिन, सुभाष पालेकर का नाम हटाकर सिर्फ प्राकृतिक खेती नाम से प्रचार कर रहे हैं और इस मेरे द्वारा खोजित तकनिक को उन्होंने खुद खोजा है,ऐसा वातावरण निर्मिति कर रहे है, मेरे द्वारा लिखी हिंदी की किताब में लिखा मेराही तकनीक को मेरी लिखित यां मौखिक अनुमति लिए बिना उनके द्वारा लिखे हिंदी किताब में डालकर नई किताब लिखी।

क्या किसी लेखक द्वारा लिखी किताब की उस लेखक के लिखित अनुमति के बिना नकल copy करना सांवैधानिक है , संविधान मान्य है, क्या यह बर्ताव कानून सम्मत है?  क्या यह सांवैधानिक दायित्व को निभाना है ? क्या यह उनकी कृति भारतीय उच्चतम संस्कृती को आगे बढ़ा रही हैं?

जो खुद विदेशी गाय की गोशाला पालते है, लोगों को विदेशी गाय का दूध मिठाइयां खिलाते है,वे सौ प्रतिशत देशी गो पालन का प्रचार करने वाले और विदेशी गाय के कट्टर विरोधी सुभाष पालेकर कृषि के प्रचारक कैसे हो सकते हैं? किस नैतिक अधिकार से खुद को प्रचारक बना बैठे हैं?.

     मैं महीने के चौबीस दिन किसानों के, सरकारों के, संगठनों के, संस्थाओं के द्वारा आयोजित मेरे शिबीरो में , संगोष्ठी में पूरे देश में व्यस्त रहता हूं, देश के सामने खड़ी गम्भीर समस्याओं का वैज्ञानिक सम्पूर्ण समाधान सौ प्रतिशत स्वदेशी सुभाष पालेकर कृषि के माध्यम से देश को, किसानों को दे रहा हूं, लेकिन मैं मेरे किसी भी शिबीर का कुछ भी मानदेय ( मानधन honourarium ) नहीं लेता, विगत चालीस साल से मेरी निशुल्क सेवा दे रहा हूं। 

तब भी मेरे साथ यह जानबूझकर अन्याय क्यो किया जा रहा हैं? क्यों मेरे साथ और हमारे जन आन्दोलन के साथ यह छल कपट हो रहा है?

             दूसरी ओर,जो लगातार ज्ञान के जगह पर अज्ञान फैला रहे है , जिनके विदेशी विनाशकारी रासायनिक खेती और विदेशी विनाशकारी जैविक खेती कृषि तकनिक से जीव जमीन पानी पर्यावरण और जैव विविधता का विनाश हो रहा हैं, लोगों को जहरीला भोजन खिलाकर उन्हे कर्करोग cancer, मधुमेह diabetes, उच्च रक्तचाप high blood pressure, हृदय बंद heart attack जैसे जानलेवा बीमारियों से मृत्यू के तरफ ले जा रहे हैं , उनका सम्मान हो रहा है, उनके पास कोई समाधान नहीं है, उन्हे नेतृत्व दिया जा रहा हैं, यह कैसी नीती है भाई ? 

    अब यह सब बंद होना चाहिए। वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन, नकली बुद्धिमता artificial intelligence ये दो मानव निर्मित महा विध्वंसक विनाशकारी भस्मासुर मानव समेत सम्पूर्ण सजीव सृष्टि का विनाश करने के तरफ तेजी से अग्रेसर होकर आगे बढ़ रहे हैं , इन्हे रोकना है तो अपने अपने आपसी मतभेद और मनभेद मिटाकर सब मिलकर हम शाश्वत समाधान दे सकते हैं।

 इसलिए परस्पर रचनात्मक सर्जन शील अहिंसक संवैधानिक संवाद की आवश्यकता है। उस के लिए हम तैयार है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सबसे तेजी से पैसे कमाने के कुछ तरीके जानें

स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता

शिव ध्वज फहराकर सबने की बुराइयों से मुक्त होने की प्रतिज्ञा