SPK के बारे में पद्मश्री डॉक्टर सुभाष पालेकर का आह्वान

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर 

साथियों और बहनों,

सुभाष पालेकर कृषि को जबरन अनाधिकार असंवैधानिक तरीके से सिर्फ प्राकृतिक खेती के नाम से पुकारने वाले कुछ गैरजिम्मेदार लोग देश के किसानों को, सरकारों को और देश को खुले आम गुमराह कर रहे है,यह तकनीक की चोरी हैं, डकैती है, यह भारतीय संस्कृति सभ्यता नहीं है, राम राज्य नहीं है।

एक वचनी सत्य वचनी प्रभू रामचन्द्र जी के भारत में हम रह रहे है, हम हमे तभी रामभक्त कह सकते है, जब हम श्रीराम जी की तरह सौ प्रतिशत सत्य ही बोलेंगे, झूठ बिलकुल नहीं बोलेंगे। ज्ञान विज्ञान सत्य अहिंसा और सत्यार्थी धर्म ( अधर्म नहीं)ये हमारे भारतीय संस्कृति सभ्यता के मूलभूत सिद्धान्त रहे हैं और आध्यात्म,योगा, शाकाहार और शुद्ध आयुर्वेद हमारे भारतीय जीवन शैली के आधार स्तंभ रहे है। इस सिद्धांतो का पालन करने से ही हमारे देश में दोबारा राम राज्य पुनर्स्थापित हो सकता हैं, जिसके लिए आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए

। आत्मनिर्भर भारत बनाना आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के बिना संभव नहीं है और आत्मनिर्भर कृषि के बिना आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था बिलकुल संभव नहीं है। फिर सवाल पैदा होता है की इस आत्मनिर्भर कृषि के सपने को साकार करने हेतू कौनसा कृषि तकनीक उपयुक्त है? विदेशी रासायनिक खेती, यां विदेशी जैविक खेती यां विदेशी आफ्रीकन परम्परागत गो आधारित खेती यां विदेशी वैदिक कृषि यां नकली योगिक खेती यां विदेशी बायो डायनामिक खेती यां शतप्रतिशत स्वदेशी सुभाष पालेकर कृषि ?

        पुरे देश मे इन सभी प्रचलित विभिन्न कृषि तकनीकों का गहरा सूक्ष्म अभ्यास करने हेतू इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए भारत सरकार के नीती आयोग ने नीती आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्री राजीव कुमार जी के नेतृत्व मे पूरे देश मे एक खोज अभियान चलाया गया की कौन सा कृषि तकनीक आत्मनिर्भर कृषि के द्वारा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का सपना साकार करेगा और किसानों की आय दुगुनी करेगा ? इन सभी प्रचलित विभिन्न कृषि पद्धतियों की सम्पूर्ण वैज्ञानिक छानबीन करने के उपरान्त अंत में नीती आयोग एक अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच गया की आत्म निर्भर भारत और किसानों की दुगुनी आय सिर्फ पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी के कृषि तकनीक सुभाष पालेकर कृषि से ही संभव है। इस तरह की जाहिर घोषणा नीती आयोग ने और हमारे देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र भाई मोदी जी ने और संसद के अर्थ संकल्पीय अधिवेशन में माननीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी ने की। प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र भाई मोदी जी ने कभी भी विदेशी विनाशकारी जैविक खेती का समर्थन नहीं किया, खुले आम सिर्फ़ सुभाष पालेकर कृषि का ही समर्थन एवम पुरस्कार किया। 

     पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर जी के द्वारा खोजी जिस कृषि तकनीक में सिर्फ बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत, आच्छादन, वाफसा और सहजीवि अन्तर फसलों की अधिकतम जैव विविधता है, उस तकनीक को पुरी दुनिया में... सुभाष पालेकर कृषि ....कहते हैं। लेकिन कुछ हमारे देश के पुरी तरह भ्रमीत मित्र सुभाष पालेकर कृषि को आर्गेनिक खेती यां गो आधारित खेती यां प्राक्रतिक कृषि ये नाम जबरन दे रहे हैं। क्या यह उनकी कृति सत्य वचनी हैं यां असत्य है, झूठी है ? इसका वैज्ञानिक आध्यात्मिक विश्लेषण हम करेगें। 

       कुछ गैर सरकारी संगठन, कुछ तथाकथित सामाजिक अध्यात्मिक संघठन, सरकारी कृषि विभाग और जिनके ऊपर संविधान की सुरक्षा का भार सौंपा गया है वे संवैधानिक पद पर आसीन एक मेरे करीबी साथी, और कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं जो मेरे बार बार मना करने के पश्चात भी जबरन सुभाष पालेकर कृषि को सिर्फ .... प्राकृतिक खेती यां जैविक खेती यां विदेशी गो आधारित खेती....नाम से पुकारते हैं। क्या यह उनकी यह कृति सच सत्य है यां झूठ है? क्या इनका इस तरह का झूठ बोलने का बर्ताव मानवी संस्कृति एवम सभ्यता के अनुकूल है, श्री राम राज्य के सिद्धांतो से मिलता है, क्या उनका यह बर्ताव सांवैधानिक हैं? इसपर खुली चर्चा होनी चाहिए। क्योंकी वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन के विनाशकारी विध्वंसक परिणामों से मानसून का अस्तित्व ही समाप्त होने की गंभीर संभावना सामने खड़ी है, जिस से खेती करनाही असंभव हो जायेगा, पुरे देश में भयावह भूख मरी फैलनेके संभावना को नकारा नहीं जा सकता। साथ में इस वैश्विक तापमान वृद्धि से पुरे दुनियाकी और हिमालय की हिम नदियां और हिम शिखरों पर जमा हिम की परत तेजी से पिघल रही है, जिस से निकट भविष्य में चालीस करोड़ उत्तर भारतीय जनता की जीवन दायिनी बनी पवित्र गंगा नदी को बहने के लिए पानी ही नहीं मिलेगा, क्योंकि साल के आठ महीने गंगा में आने वाले पानी का स्त्रोत ये हिम नदियां हैं, वे ही पूरी तरह पिघल जाएगी तब गंगा नदी सुख जायेगी, तब पुरे उत्तर भारतीय और उत्तर पूर्वी भारतीय खेती पानी के अभाव से अनाज पैदा नहीं कर पाएगी, पीने के लिए पानी नहीं मिलेगा, उद्योगों के लिए पानी नहीं मिलेगा, पुरे भारत देश की खाद्य सुरक्षा भयावह धोखे में आएगी, उत्तर भारत का मानवी जीवन ही उध्वस्त हो जाएगा। इस के लिए ज़िम्मेदार हरित गृह वायुवो का अनियंत्रित उत्सर्जन, और इस उत्सर्जन होने के लिए जिम्मेदार वस्तु निर्माण उद्योग, वाहन, भवन निर्माण उद्योग,मानवी पाश्चात्य अतिरिक्त भोगवादी जीवन शैली, विदेशी आफ्रीकन गो आधारित खेती, विदेशी  जैविक organic खेती,विदेशी  रसायनिक खेती। 

          प्राकृतिक मानें प्रकृति मे जो अस्तित्व में है वह। Which is exited in the Nature,that is natural.। प्राकृतिक खेती मानें जिन जिन  संसाधनों का उपयोग ईश्वर द्वारा निर्मित प्रकृति में ईश्वर करता है, उसे हम प्राकृतिक खेती कह सकते हैं, अन्यथा नहीं। आज दुनिया में सुभाष पालेकर कृषि समेत जितने भी कृषि तकनीकों को किसान अपने खेत में उपयोग में ला रहे हैं, उन सभी तकनीकों में भूमि की ज्योताई हैं, बीज बोआई है, पौध रोपण है, भूमी की निराई गुड़ाई है, सिंचाई हैं, छिड़काव है, फसल कटाई ये सारे कृषि कर्म है। क्या ये सारे कृषि कर्म प्रकृति में अस्तित्व में है? बिलकुल नहीं है। ईश्वर निर्मित प्रकृति के घने जंगलों में मानवी ज्योताई नही हैं, बीज बोआई नहीं है, पौध रोपण नहीं है, भूमि की निराई गुड़ाई नही हैं, सिंचाई नही हैं, छिड़काव नहीं है, फसल कटाई नहीं है, कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। सुभाष पालेकर कृषि में इनमे से हर कृषि कर्म किया जाता हैं, जो प्रकृति में बिलकुल अस्तित्व में नहीं हैं, तब सुभाष पालेकर कृषि यां अन्य सभी कृषि पद्धतियां प्राकृतिक कैसे हो सकती हैं? इसका अर्थ है कि सुभाष पालेकर कृषि प्राकृतिक नही हैं,तब भी उसे जबरन प्राकृतिक खेती कहना, सुभाष पालेकर कृषि जैविक खेती organic नहीं है,तब भी उसे जबरन जैविक खेती कहना, सुभाष पालेकर कृषि विदेशी आफ्रिकन  गो आधारित खेती नही हैं,तब भी उसे गो आधारित खेती कहना, सुभाष पालेकर कृषि फुकुओका प्राकृतिक खेती नही हैं,तब भी उसे जबरन फुकुओका प्राकृतिक खेती कहना, यह सारा प्रचार सौ प्रतिशत झूठ असत्य बोलना है, छल कपट हैं, जो सत्य वचनी प्रभु रामचन्द्र जी के सिद्धांतो के विरोध में खुली बगावत हैं, सत्य अहिंसा धर्म ( अधर्म का नही) का संदेश दुनिया को देनेवाले भारतीय संस्कृति सभ्यता के विरोध में यह उनका बर्ताव हैं। भारतीय संविधान   हमे झूठ असत्य बोलने का आदेश नही देता, ऐसी कोई भी धारा संविधान में नहीं हैं, बल्कि संविधान असत्य झूठ का पूरा विरोध करता हैं, इसका अर्थ है कि सुभाष पालेकर कृषि को जबरन प्राकृतिक खेती यां जैविक खेती या विदेशी गो आधारित खेती इस तरह के झूठे नाम देना सौ प्रतिशत असंवैधानिक है, संविधान की सुरक्षा नही हैं, संविधान को नुकसान पहुंचा ने वाली कृति है, जो नहीं होनी चाहिए। अभी भी समय नही गया है, सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती यां गो आधारित खेती यां जैविक खेती organic farming कहने वाले ये मेरे सभी मित्र उनके इस देश को गुमराह करने वाले झूठे असत्य छल कृति को देश के हित मे रोक सकते हैं, बंद कर सकते हैं। अब आपस में लढ़नेका समय नही है, सभी ने एक साथ आकर इस वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन, एवम नकली बुद्धिमता artificial intelligence जैसे महा शत्रु को पराभूत करने की आवश्यकता है।ऐसा आप करे यह उनसे मेरी विनम्रता पूर्वक प्रार्थना है। देश में राम राज्य लाने के लिए और भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह बहुत आवश्यक बन गया है। 

     ओर्गानिक माने जैविक खेती सौ प्रतिशत विदेशी हैं, जिसमें कम्पोस्ट खाद, वर्मी कम्पोस्ट खाद, बायो डायनामिक खाद, अखाद्य खल्लिया,वेस्ट डीकम्पोजर, गो कृपा अमृतम जैसी अप्राकृतिक विनाशकारी नास्तिक खादों का उपयोग किया जाता हैं। इन सभी जैविक खादों का प्राथमिक विघटन एक्टिनोमायसिटीज सूक्ष्म जीवाणु करते हैं, उस विघटन में से कार्बन और अमोनिया इन दोनों का उत्सर्जन होता हैं, हवा में इस कार्बन का प्राणीदीभवन oxidation प्राणवायु oxygen से होता हैं , जिससे कार्बन डाइऑक्साइड वायु की निर्मिति होती है, जो हवा में ठहरता है,यह हरित गृह वायु green house gas हैं जो वैश्विक तापमान वृद्धि हुई जल वायु परिवर्तन की निर्मिति करता हैं। यह उत्सर्जित अमोनिया का नाइट्राइट्स में रूपांतर करने का कार्य नाइट्रोसोमोनास सूक्ष्म जीवाणु और नाइट्रो कॉकस सूक्ष्म जीवाणु करते हैं, आगे इस नाइट्राइट्स का नाइट्रेट्स में रूपांतर नाइट्रो बैक्टर सूक्ष्म जीवाणु और पेनिसिलियन फफूंद fungus दोनो करते हैं, आगे इस नाइट्रेट्स का मुक्त नाइट्रोजन में करने का कार्य माइक्रो कॉकस डी नाइट्रिफाइंग बैक्टीरिया करते हैं, जिस से यह मुक्त नाइट्रोजन हवा में उत्सर्जित होकर उसका हवा में होने वाले प्राणवायु के साथ प्राणीदीभवन oxidation होकर उसका नाइट्रस ऑक्साइड वायुमे रूपांतरण होता हैं, जो हवा में स्थिर होता है, वह हरित गृह वायु green house gas हैं जो वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहा है। गोबर खाद निर्मिति क्रिया में , कम्पोस्ट खाद निर्मिती क्रिया में, वर्मी कम्पोस्ट खाद निर्मिती क्रिया में विशाल मात्रामे अवायु जीवी अनएरोबिक बैक्टीरिया के माध्यम से मिथेन वायु की निर्मिति होकर वह हवा में उत्सर्जित होता है, जो हरित गृह वायु green house gas हैं, जो वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं। ये विदेशी गो आधारित खेती, जैविक खेती, रासायनिक खेती के द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड, नायट्रस ऑक्साइड, और मिथेन जैसे हरित गृह वायु की निर्मिति होती हैं, जो वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं। सौ प्रतिशत स्वदेशी सुभाष पालेकर कृषि में हरित गृह वायु का उत्सर्जन बिलकुल होता नही, क्योंकि हम कोई भी गोबर खाद, कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट खाद, अखाद्य खल्लिया, रासायनिक खाद डालते ही नहीं, किसी भी खाद का उपयोग करते नही। 

      यह विदेशी जैविक ओर्गानिक खेती, गो आधारित खेती, रासायनिक खेती, बायो डायनामिक खेती भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट करती हैं, इन के संसाधनों की कीमत रासायनिक खेती के संसाधनों के कीमत से कई गुना ज्यादा है, किसानों को लूटनेवाली हैं। हमारा सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन इस विनाशकारी विदेशी जैविक खेती के ,विदेशी गो आधारित खेती के,जो अस्तित्व में ही नहीं है उस छल कपटी प्राकृतिक खेती के कट्टर विरोधी है, तब ये हमारे मान्यवर मित्र सुभाष पालेकर कृषि को आर्गेनिक खेती कह रहे हैं, प्राकृतिक खेती कह रहे है,गो आधारित खेती कह रहे हैं,किस वैज्ञानिक आधार पर और किस अधिकार से कह रहे हैं ? अर्थात ये लोग सौ प्रतिशत झूठ असत्य बोल रहे हैं, और मुंह मे सत्यवादी प्रभु रामचन्द्र जी का जाप करते हैं , इस तरह का झूठ बोलकर भारतीय संस्कृति सभ्यता की और संविधान की ऐसी तैसी कर रहे है। इस तरह का असंस्कृत असभ्य बर्ताव नहीं करना चाहिए, जिससे हमारे भारतीय संस्कृति की बदनामी होती हैं।

      कुछ हमारे मित्र सुभाष पालेकर कृषि को परम्परागत गो आधारित कृषि कहते हैं। मैं उनसे बताना चाहूंगा कि सुभाष पालेकर कृषि सिर्फ गो आधारित कृषि नहीं है, गो आधारित जीवन शैली है, गोमाता को कटाई से बचाने का एकमात्र अहिंसक संवैधानिक अध्यात्मिक उपाय है। मेरा शिबीर सुनने के पहले किसान अज्ञान वश देशी गोमाता को दलालों को बेचता है, दलाल उसे कटाई के लिए कसाई खाने भेजता है, जहां उसे काटा जाता हैं। लेकिन, किसान जैसें ही मेरा सुभाष पालेकर कृषि विषय पर आयोजित शिबीर सुनता है, गो माता को बेचता नही, वह कहा मिलती है, ढूंढता है और उसे दलालों से ऊंचे दामों पर खरीदकर ही दम लेता है, तब गोमाता कटाई के लिए कसाई खाने नही जाती ,गो हत्या को रोकने का काम सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन कर रहा है। सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन गो रक्षा का अहिंसक संवैधानिक अध्यात्मिक अभियान हैं। गोमाता को बचाने का काम सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन में शामिल किसान कर रहे हैं, गोशाला गोमाता को नहीं बचा सकती है, क्योंकि वे लोगो द्वारा दिए आर्थिक दान पर चलती हैं, जो आजकल मिलना असंभव बन रहा है। गोमाता को किसी धनवान के दया पर छोड़ना गो भक्ति नही हो सकती। क्या हम हमारी जन्मदात्री सगी माता को किसी के दया पर छोड़ते हैं? नही ना? फिर गोमाता को क्यों? गो शालाओं को आर्थिक मदद देकर चलाना तमाम सरकारों दायित्व है।

    हजारों सालों से हमारे देश में चली आ रही परम्परागत गो आधारित कृषि उसे कहते हैं, जिस में गोबर खाद डाला जाता हैं और बैलों से भूमि की ज्योताई होती हैं, ट्रैक्टर से ज्योताई बिलकुल नहीं होती है और सिर्फ बैलों से चलने वाले बैल गाड़ी से गोबर खाद की और कृषि उपज का वहन होता हैं, ट्रैक्टर से बिलकुल नहीं। पुरे भारत में इस तरह की गो आधारित खेती करने वाला एक भी किसान नही हैं। सुभाष पालेकर कृषि में गोबर खाद बिलकुल डाला नही जाता, लेकिन कृषि उपज का वहन ट्रैक्टर से होता हैं। तब हम सुभाष पालेकर कृषि को शुद्व रुप मे गो आधारित खेती कैसे कह सकते है? सुभाष पालेकर कृषि गो आधारित जीवन शैली है, गोमाता को गो हत्या से बचाने का सांवैधानिक अहिंसक अध्यात्मिक जन आंदोलन है । 

     अगर आप परम्परागत गो आधारित खेती से उतनी प्रति एकड़ उपज लेना चाहते है, जितनी प्रति एकड़ उपज रासायनिक खेती से मिलती हैं,तब मेरे अनुसंधान के निष्कर्ष के अनुसार आपको गो आधारित खेती में हर साल प्रति एकड़ 20 बैल गाड़ी माने 10 मेट्रिक टन गोबर खाद डालना ही पड़ेगा। क्या यह किसानो को संभव है? बिलकुल नहीं, सपने मे भी किसान प्रति एकड़ हर साल बीस बैल गाड़ी गोबर खाद डाल नही सकता, सिर्फ बड़ी बड़ी गो शालाओं को सम्भव है। माने परम्परागत गो आधारित खेती व्यवहारिक भी नहीं है।

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