एक गौशाला ऐसा भी ..

 एक गोशाला ऐसा भी (श्रीगोधाम पांचवां धाम)



संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग (यूएसडीए) अनुसार, भारत दुनिया भर में सबसे अधिक गायों वाला देश है। यह देश "पवित्र" होने के कारण मवेशियों की विशेष रूप से रक्षा करता है।


सनातन मान्यतानुसार गौमाता संपूर्ण ब्रह्मांड अर्थात साक्षात नारायण का स्वरूप हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि गौमाता की पूजा-अर्चना करने से सृष्टि के 33 करोड़ देवी - देवताओं की आराधना का फल मिलता है. अतः सनातन मान्यतानुसार घर में बनी सबसे पहली रोटी भी गौमाता को हीं खिलाने का प्रावधान है. वेद पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति गाय और गोवंश की सेवा करता है, उसपर आने वाली विपदाएं समाप्त हो जाती हैं। कहा जाता है कि गाय के खुर्र में नागदेवता का वास होता है, इसलिए जिस जगह गाय अपने खुर्र रखती है, उस जगह सांप-बिच्छू आदि नहीं आते। मान्यता है कि गाय के एक आंख में सूर्य तो दूसरी आंख में चन्द्र देव का वास होता है। गाय के सींगों में भगवान शिव का वास, उदर में भगवान शिव के बड़े बेटे कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सींगों के आगे वाले भाग में भगवान इन्द्र, कानों में अश्विनीकुमार, दांतों में गरुड़ और जिह्वा में सरस्वती निवास करती है। 


अतः सनातन मान्यतानुसार गाय को माता माना जाता है और उसकी सेवा एवं रक्षा करना नेक और पुण्य कर्म माना जाता है।

पुण्य का अर्थ है? हमारे काम से यदि दूसरे की मदद होती है तो, वह पुण्य है। हमारे जिस काम से दूसरे को सुख पहुंचे, वह भी पुण्य है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना या उसको दान देना भी पुण्य है। निस्वार्थ भाव से ऐसे कर्म करना जिससे किसी दूसरे को कष्ट ना हो वह भी पुण्य की श्रेणी में ही आता है । यानि सनातनी हिंदू गाय और गौ वंश की सेवा और रक्षा करना धर्म और पुण्य का कार्य मानता है। ऐसे में जो गौवंश की सेवा और रक्षा नहीं करता है वह कहीं न कहीं धर्म से विमुख भी होता है। वैसे भी हमारा देश भारत हजारों वर्षों से एक कृषि प्रधान देश ही है। भारत की कृषि व्यवस्था भले हीं दशकों से चरमरायी हुई दिखती है लेकिन भारत के चरमरायी हुई कृषि व्यवस्था के पिछे जो सबसे बड़ा कारण है वह भी यहीं है कि भारतीय कृषि व्यवस्था अब पूरी तरह से गौवंश पर आधारित नहीं रह गई है। पहले जब ज्यादातर किसान गौवंश की रक्षा और सेवा करने की भावना के साथ साथ कृषि के लिए गौवंश के बैलों का भी सहारा लिया करते थे तो उन्हें कृषि उत्पादन लेने के पहले कृषि में आनेवाले खर्च में बचत भी होती थी। तब किसानों को आज की तरह जमीन के लिए हानिकारक रासायनिक खाद में भी होने वाले खर्च की बचत की वजह से इन गौवंश की रक्षा और सेवा करने का लाभ भी इस प्रक्रिया को अपनाए रखने के क्रम से स्वतः पहुंचते रहता था। लेकिन जैसे जैसे भारत के किसान गौवंश की रक्षा और सेवा करने के बिना बाहर से आयातित कृषि उपकरणों एवं कृषि की विदेशी व्यवस्था पर अपनी निर्भरता बढ़ाने लगे वैसे वैसे उन्हें कृषि में बढ़ते खर्चों का भी निरंतर सामना करना पड़ा जिनकी वजह से किसानों की आर्थिक हालात भी दिन ब दिन बद से बदतर होती गई। ऐसे में भारत जैसे कृषि प्रधान देश के किसानों को गौवंश की सेवा और ऱक्षा के महत्व को पुनः विकसित करने की भी नितांत आवश्यकता है। इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए अब भारत में गौशाला संचालित करने के लिए सरकार भी धन देती है तथा गऊ प्रेमी भी दान करते हैं कुछ धनी और परमार्थी व्यक्ति भी गौशालाएं इसलिए चलाते हैं ताकि उस गौवंश की रक्षा की जा सके जो हजारों वर्षों से हमारे मिट्टी और स्वास्थ्य की भी रक्षा करते आए हैं। हालांकि कुछ लोग गायों और गोवंश से आज भी अच्छे पैसे कैसे कमाते हैं क्योंकि वे इनकी सेवा करने के साथ साथ इनके रखरखाव की स्वयं भी अच्छी जानकारी रखते हैं? 

ऐसे में माना जाता है कि भले हीं आज पारिवारिक दूध देने वाली गाय को रखना महंगा हो सकता है, लेकिन यह आज भी अन्य कई तरह से नकदी कमाने की कई अन्य महत्वपूर्ण तथा अति लाभकारी तरीके भी प्रस्तुत करती है। इनमें बछड़े, गाय या बैल बेचना, स्टड सेवाएं प्रदान करना और दूध बेचने के अलावां खाद, गौमूत्र और गोबर से कई अन्य उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करना भी शामिल है।


भारत में बहुत पहले मवेशी और गौवंश के लिए चारागाह की अच्छी व्यवस्था और उपलब्धता रहा करती थी लेकिन जैसे जैसे चारागाह कम होते गए पशुओं के चारा और रखरखाव पर आने वाले खर्च भी बढ़ते चले गए जिनकी वजह से किसानों का गौवंश से भी लगातार मोहभंग होने लगा। फिर भी यह एक सच्चाई है कि भारत का स्वर्णकाल जिस समय को कहा गया है उसके जड़ में भी गौवंश की रक्षा और सेवा का भाव ही सबसे पहले सम्माहित किया गया था। जिनके बल पर आगे चलकर भारत को पूरी दुनिया में सोने की चिड़ियां के नाम से भी जाना गया। ऐसे में भारत में आज गौवंश और गौशाला के इतिहास को कुछ और भी बारीकी से जानने की आवश्यकता है।  


सनातनी मान्यताओं के आधार पर भारत में गाय को हजारों वर्षों से भगवान का साक्षात स्वरूप मानने की परम्परा है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि धेनुनामस्मि कामधेनु अर्थात मैं गायों में कामधेनु हूं। हिंदू या सनातन धर्म के अनुसार कामधेनु गाय की संज्ञा एक ऐसे गाय को दी गई है जिससे कोई जब भी जो चीज भी पाने की इच्छा करे वह चीज उसे प्राप्त होती है। भावार्थ हम समझ सकते हैं कि कामधेनु गाय हमारे सभी आवश्यक मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली है। लेकिन गाय के बारे में इन सभी सनातनी मान्यताओं के बावजूद भी आज भारत में गायों की रक्षा और पालन-पोषण के लिए फिर गौशाला की आवश्कता भी आखिर क्यों पड़ती जा रही है आइए अब यह बात भी हम जानने की कोशिश करते हैं। 

सनातन मान्यताओं के आधार पर हम यह बात कह सकते हैं कि भारत में गौवंश की रक्षा करने की और सेवा करने की भावना पहले हर एक भारतीय की भावना में केवल यहां के धार्मिक मान्यताओं के आधार पर हीं सभी में सम्माहित करने की कोशिश की गई थी। लेकिन जैसे जैसे भारतीय इस भावना से बाहर निकलने लगे वैसे वैसे गौवंश की उपेक्षा की शुरुआत भी होने लगी। भारतीयों में गौवंश के रखरखाव और देखभाल की भावना में कमी आती गई जिनकी वजह से कुछ गौवंश की रक्षा और सेवा करने की प्रबल भावना लिए लोगों को बाद में गायों की बढ़ती उपेक्षा को देखते हुए जगह जगह पर धीरे धीरे गौशालाओं की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। ऐसे में गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने के तरीकों को अपनाने की भी आवश्यकता है।  ताकि गौवंश किसी के उपर भार न हो और यह किसानों तथा आम लोगों के आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में फिर से ज्यादा से ज्याद कारगर भी साबित हो सके।


इस तरह से हम सभी भारतीय अपने देश की सभ्यता-संस्कृति में सम्माहित गौवंश की रक्षा और सेवा की भावना के साथ इन गौशालाओं के महत्व को अच्छी तरह समझ सकते हैं। आज भारत में बुनियादी पशुपालन आंकड़ों के अनुसार, गौशालाओं की संख्या लगभग 7600 से ज्यादा है। इस तरह से वैदिक काल से ही भारतीयों द्वारा गोवंश का कृषि एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों, सामाजिक, धार्मिक एवं औषधीय आवश्यकताओं के लिए पालन-पोषण किया जाता रहा है। लेकिन अन्य गायों की अपेक्षा देशी गोवंश में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी अधिक होती है तथा ये देश की जलवायु को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त हैं। देशी गोवंश के रख रखाव व भरण-पोषण पर विदेशी गोवंश की अपेक्षा कम व्ययभार आता है। हाल ही में मकर-संक्रांति के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ऐसा विडियो काफी लोगों को पसंद आया जिसमें देसी नस्ल की कुछ छोटी छोटी गायों को चारा खिलाते हुए और उनके साथ अपना कुछ समय बिताते हुए पीएम मोदी स्वयं नजर आए। ये सभी गायें पुंगनूर गायें थीं भारतीय नस्ल की इन गायों को दुनिया की सबसे छोटी गाय मानी जाती है। रिसर्च की मानें तो पुंगनूर गाय अकेली छोटी नस्ल की गाय नहीं है, बल्कि केरल की वेचुर गाय भी मिनिएचर काओ यानी छोटी गाय की लिस्ट में शामिल है. वेचुर गाय की लंबाई 3 से 4 फीट तक ही होती है, लेकिन पुंगनूर गाय की लंबाई इससे भी कम है. आंध्र प्रदेश में 1 से 2 फीट लंबाई वाली पुंगनूर गाय भी मौजूद हैं.

 ऐसे हीं देशी नस्ल की कुछ गायों की एक गौशाला देहरादून से लगभग 20 किलोमिटर की दूरी पर स्थित श्रीगोधाम गौशाला है जिसे पांचवांधाम के नाम से भी जाना जाता है। जब मैनें इस गौशाला के संस्थापक विक्रम गोयल से पूछा श्रीगोधाम का नाम आपने पांचवांधाम भी क्यों रखा तो उनका जवाब क्या था आप खुद सुनें इस गौशाला में ऐसी सभी गायों की ईलाज की जाती है जिससे एक देशी गाय की खराब स्वास्थ्य को सामान्य स्थिति में लाई जा सके । जबकि, किसान पालने के लिए इस गौशाला से स्वस्थ और दूध देने वाली देशी गाय भी उनकी ऱखरखाव से संबंधित कुछ आवश्यक शर्तों के साथ बिल्कुल मुफ्त में यहां से अपने घर ले जा सकते हैं।  



देहरादून के पास श्रीगोधाम पांचवां धाम के नाम से मश्हूर यह गौशाला एक ऐसे जगह पर स्थापित की गई है जिसके आसपास का वातावरण भी काफी मनोरम दिखता है। 


यहीं कारण है कि यहां जाने के साथ साथ इसके आसपास के मन को मोहित कर लेने वाले जगहों का मनोरम दृश्य भी देखकर, भारत के अतित और वर्तमान का एक आकर्षक दृश्य यहां के दर्शनार्थियों के मन-मस्तिष्क और याद्दाश्त में सदा सदा के लिए सम्माहित हो जाता है। आज के समय में गौसंवर्धन के लिए भारत में कई योजनाएं और गौशालाएं चलाई जा रही हैं. गौसंवर्धन" का अर्थ है स्वदेशी नस्लों का संरक्षण और विकास। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 तक भारत में गोवंशी पशुओं (Bovines) की संख्या 30 करोड़ से ज्यादा थी. इनमें 8 करोड़ ही दूध देने की काबिल हैं जबकि दूध नहीं देने वाले गोवंशी पशुओं की संख्या इनकी अपेक्षा लगभग तीगुनी है। ऐसे में यह आंकड़े नीति आयोग को इससे संबंधित नीति बनाने की दिशा में बड़ी संभावनाओं की तलाश में आगे बढ़ने कीओर सुस्पष्ट ईशारा करती हैं।  ऐसे में अन्य कई महत्वपूर्ण गौशालाओं के अलावां देहरादून के पास का यह श्रीगोधाम पांचवांधाम के नाम से प्रसिद्ध यह गौशाला भी कई ऐसा प्रयास कर रहा है जिससे गौशाला को पूरी तरह से आत्मनिर्भरता प्रदान की जा सके। देहरादून के पास के इस श्रीगोधाम पांचवांधाम गोशाला और अन्य गौशालाओं के बारे में आपका क्या कहना है यह बात भी हमें कमेंट कर जरूर बताएं और अगर आपको यह वीडियो अच्छी लगे तो इस वीडियो को लाइक और शेयर भी जरूर करें..

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