SPK क्या है
पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर
व्हाटस एप नं 9850352745
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palekarsubhash@yahoo.com
विषय....सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक कृषि Natural farming कहते हो, सुभाष पालेकर कृषि को फुकुओका प्राकृतिक कृषि कहते हो, सुभाष पालेकर कृषि को गो आधारित खेती कहते हो,...... ..सौ प्रतिशत विदेशी होने वाले विनाशकारी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक होने वाले, वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले, भुमी की उर्वरा शक्ति को नष्ट करने वाले और किसानों का कई गुना ज्यादा शोषण करने वाले जैविक खेती organic farming को स्वदेशी कहते हो, उसके प्रचार के संस्थान खोलते हो,..... सौ प्रतिशत झूठ बोलते हो, देश को गुमराह करते हो, न तुम्हें संविधान का डर है, न सभ्यता की लज्जा है और न भगवान का डर है। सत्यवादी एकवचनी प्रभू रामचंद्र जी के महान भारत में झूठ बोलना महापाप है, झूठ बोलना असत्य वचन सत्यवादी प्रभू रामचंद्र जी से कियी बगावत है, अभी तो आंखें खोलो,सजन रे झूठ मत बोलो।
परम आदरणीय साथियों और बहनों,
मान्यवर, सपने में दान दिया हुआ राज्य जागृत में प्रत्यक्ष दान करके खुद वनवास जाने वाले सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के वंशज सत्य वचनी प्रभू रामचंद्र के इस महान भारत देश में कभी सत्य का झुठ असत्य पर विजय होता था, बुराईयों पर सच्चाई का विजय होता था, उस विजय को उत्सव के रूप में मनाने के इस परम पवित्र दीपावली के दीपोत्सव पर्व पर आज मैं आपसे कुछ मेरे मन की तीव्र पीडा साझा करना चाहता हूं। दीपोत्सव माने ज्ञान विज्ञान सत्य अहिंसा धर्म और संस्कृति के दिये जलाकर उस उज्वल प्रकाश से अज्ञान अविज्ञान असत्य हिंसा अधर्म असंस्कृत रुपी अंधेरे को सदाके लिए भगा देना ।वास्तव में सत्य वचनी प्रभू रामचंद्र जी के इस महान भारत देश में होना चाहिए झुठ असत्य पर सत्य का विजय। लेकिन हमें तो चारों तरफ आजकल झुठ का ही बोलबाला दिखाई दे रहा है। ज्ञान के नाम पर अज्ञान का बोलबाला, सत्य के नाम पर असत्य झुठ का प्रचार, किसी के सौ प्रतिशत स्वदेशी दर्शन एवं तकनीक की चोरी डकैती, स्वदेशी के नाम पर विदेशी का प्रचार धड़ाके से चल रहा है। मुंह में स्वदेशी का जाप लेकिन कृति में ठीक उलटा विदेशी का प्रचार।सर्वत्र झुठ का ही बोलबाला है, झूठ बोलने वालों एवं झुठ बोलकर देश को गुमराह करने वालों को गौरवान्वित किया जा रहा है।
मैंने सन् 1972 से लेकर सन 1996 तक किये कूल 24 साल के मेरे आध्यात्मिक कृषि अनुसंधान तपस्या काल में अपनी खेती और धन बेचकर किये अनुसंधान के फलस्वरूप जो जीवामृत घनजीवामृत आच्छादन वाफसा और जैवविविधता यह तकनीक मैंने खोज निकाला है, जिसे ईश्वर के मंगल प्रसाद के रुप में मैंने उसे स्वीकार किया, उसे शुरू में मैंने झिरो बजेट प्राकृतिक खेती नाम दिया था। क्यों कि बाहर से कुछ खरीदकर लाना ही नहीं है, इसलिए मुझे लगा यह शून्य लागत माने झिरो बजेट प्राकृतिक खेती ZBNF है, तब वह नाम रख दिया,जो आगे पुरे देश में विख्यात हुआ। लेकिन, आगे आगे जब मुझे मालूम पड़ा कि यह नाम गलत है, झिरो बजेट हो नहीं सकता, मजदूर लगते हैं,उनको तनख़ा देना पड़ता है, बिजली एवं पानी का बील देना पड़ता है, अर्थात झिरो बजेट खेती नाम नहीं हो सकता, बदलना ही पड़ेगा इस निर्णय पर मैं स्थिर हुआ, तब उस नाम को बदलकर मैंने नया नाम सुभाष पालेकर प्राकृतिक कृषि SPNF रखा। लेकिन आगे मैं मेरी अनुसंधान यात्रा का निरंतर पुनरावलोकन करने लगा,तब काफी चिंतन मंथन के बाद मेरे अज्ञान का पर्दाफाश होने के बाद मुझे मालूम पड़ा कि दुनिया में कहीं भी प्राकृतिक कृषि का अस्तित्व नहीं है,वह बहुत बडा झूठ हैं, तब आखिर में वह नाम बदलकर मैंने मेरे खोजें तकनीक का नया नाम सुभाष पालेकर कृषि SPK रखा, जो अब पुरे दुनिया को मालूम है, मेरे साथ बगावत करने वाले इन भगौड़े झुठे मित्रों को भी मालूम है।
जब-तक हमारी कोई भी कृति झुठ हैं यह हमे मालूम नहीं होता है, उसकी हमारे अंतरात्मा को अनुभुती नहीं होती,अज्ञान वश उस कृति को हम आगे जारी रखते हैं, तब हमारी वह कृती पाप नहीं होती। लेकिन यह कृति गलत है यह मालूम होने के बाद भी उसे अगर हम जबरन उसे आगे जारी रखते हैं, तब वह घोर पाप होता है। इसीलिए जैसे ही मेरी ग़लती मुझे महसूस माने अनुभूत हुई, तुरंत मैंने मेरे तकनीक का तत्कालीन नाम बदलकर सुधार दिया और नया नाम रखा सुभाष पालेकर कृषि SPK। क्यों कि उस दरम्यान मेरे कुछ चुने हुए वरिष्ठ सहयोगी अपने व्यक्तिगत फायदे के लालच में देश के कुछ बौद्धिक आतंकवादीयों के दबाव में आकर मेरे तकनीक को चुराकर उसे प्राकृतिक कृषि यां फुकुओका प्राकृतिक कृषि यां गो आधारित खेती का नया नाम देकर किसानों को और देश को गुमराह करने लगे थे। इसीलिए उन चोर डकैतों के झूठे प्रचार को रोकने के लिए मुझे नाम में मेरा नाम डालने के लिए मैं बाद्य हो गया था।तकनीक के नाम में सुभाष पालेकर जोड़ने के लिए सोशल मीडिया पर मेरे लाखों साथियों का दबाव निरंतर बढता जा रहा था। इसीलिए मैंने नया नाम सुभाष पालेकर कृषि Subhash Palekar Krushi...SPK रखा। इस नाम बदलाव को देश के गिने-चुने चोरों को छोड़कर सभी किसानों ने स्वीकार किया। परिणाम स्वरूप,अब मेरे मन में कोई भी आत्म क्लेश के अहसास की भावना नहीं है, मेरी मन बुद्धि चित्त शांत हैं।
नाम बदलने का अधिकार सिर्फ उस नाम को रखने वाले जनक का होता है, किसी ऐरे गैरे बौद्धिक आतंकवादीयों का नहीं है। बाॅम्बे का नाम मुंबई, मद्रास का नाम चेन्नई, अलाहाबाद का प्रयाग राज, फैजाबाद का अयोध्या, औरंगाबाद का नाम छत्रपति संभाजी महाराज नगर,पहले जनसंघ नाम था,बादमें जनता दल और आखिर में भारतीय जनता पार्टी नाम रखा गया। पहले का योजना आयोग Planing commission नाम बदलकर उसे नीति आयोग रखा गया। इस नाम बदलाव को किसी ने आक्षेप नहीं लिया। क्यों कि नाम बदलने का संवैधानिक अधिकार नाम रखने वाले जनक का होता है। उसी तरह मैंने मेरे तकनीक का नया नाम सुभाष पालेकर कृषि रखा, वह मेरा संवैधानिक अधिकार है एवं मानवाधिकार भी है। संविधान के इस वचनबद्धता के कारण मै शांत था । लेकिन आजकल उस शांति को भंग करने का काम कुछ अभारतीय असभ्य असंस्कृत घटनाएं कर रही है। हमारे देश के कुछ बौद्धिक आतंकवादी मित्रों के द्वारा फैलाए मोह जाल में फंसे मेरे जन आंदोलन के कुछ चुने हुए मेरे पूर्व साथी मेरे तकनीक के बारे में संपूर्ण झूठ असत्य प्रचार करने लगे हैं ,वे मेरे सुभाष पालेकर कृषि नाम को जबरन बदलकर उसका उन्होंने नाम रखा है प्राकृतिक कृषि, गो आधारित खेती यां फुकुओका प्राकृतिक कृषि । अब हम इनका वैज्ञानिक कसौटियों पर लेखा-जोखा लेंगे।
प्राकृतिक कृषि माने प्रकृति में जो अस्तित्व में है उसका सौ प्रतिशत अमल किया जाता है,वह प्राकृतिक कृषि। प्रकृति माने ईश्वर निर्मित मानवरहित घने जंगल। अर्थात घने जंगल में जो जो भी अस्तित्व में है,वह प्राकृतिक कृषि है,और उसे उसी अवस्था में समर्पित भाव से स्वीकार करना ही आध्यात्म है। सुभाष पालेकर कृषि में भूमि कि ज्योताई है, बीज बोआई है, पौध रोपाई है, खरपतवारों को निकालने के लिए निराई गुड़ाई weeding and hoeing है, मानवी सिंचाई है, घर में निर्मित वनस्पति जन्य कीट नाशक नीमास्त्र, अग्नि अस्त्र, दशपर्नी का छिड़काव है, फसलों की कटाई है। लेकिन ईश्वर निर्मित प्रकृति में माने घने जंगलों में ईश्वर द्वारा होनेवाले प्राकृतिक कृषि में सुभाष पालेकर कृषि में किये जाने वाले इनमें से किसी भी तकनीक का अस्तित्व बिल्कुल नहीं है। माने प्रकृति में भुमी की ज्योताई नहीं है, बीज बोआई नहीं है, पौध रोपाई नहीं है, निराई गुड़ाई नहीं है, मानवी सिंचाई नहीं है, इन कीटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं है, फसल कटाई नहीं है , कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। अब इन झुठे असत्य बोलकर देश को गुमराह करने वाले मित्रों को मेरा खुले आम सवाल है कि अगर सुभाष पालेकर कृषि में जो जो कृषि कार्य अस्तित्व में है,उनका प्रकृति में कहीं भी अस्तित्व नहीं है, तब सुभाष पालेकर कृषि को आप प्राकृतिक कृषि Natural farming किस तार्किक यां किस संवैधानिक आधार पर कह रहे हों? पुरे दुनिया में कुछ गिने चुने गौशालाओं को छोड़कर यां आवश्यकता से अधिक देशी गायों का पालन करने वाले गिने चुने कुछ किसानों को छोड़कर कोई भी किसान सिर्फ देशी गाय के गोबर खाद का उपयोग करके गो आधारित खेती नहीं करता है, सौ प्रतिशत रासायनिक खेती करते हैं। अगर फसल बढ़ने के लिए और फसल उत्पादन मिलने के लिए देशी गाय के गोबर खाद का उपयोग करना ही पड़ता है, अन्यथा फसल उत्पादन नहीं मिलेगा,यह दावा करने वाले गो आधारित खेती के प्रचारकों को मेरा खुला सवाल है कि दुनिया के अधिकांश खेती में देशी गाय के गोबर खाद का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जा रहा है, सिर्फ रासायनिक खेती हो रही है, उनकी फसले क्यों बढ़ रही है, उन्हें गो आधारित खेती से ज्यादा उत्पादन क्यों मिल रहा है? इनके पास कोई जवाब नहीं है। गोबर खाद, कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट खाद, खल्लियां डालकर विशाल मात्रा में हरित गृह वायुओं green house gases का उत्सर्जन होकर वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन global warming and climate change को बढ़ावा मिलता है, जिसके घातक परिणाम वैश्विक कृषि, प्राकृतिक संसाधनों पर ,जैव विविधता पर और मानवी स्वास्थ्य पर हो रहे हैं, हम भुगत रहे हैं। ये गो आधारित खेती और जैविक खेती भुमी के उर्वरा शक्ति को खत्म कर रही है,यह सत्य को इन लोगों के द्वारा नकारना देश को गंभीर भूखमरी के तरफ़ ले जायेगा। मैं हमारे इन बगावती मित्रों को एक अहम सवाल पुंछना चाहता हूं कि हमारे देश के संविधान में वह कौनसी धारा है, जो आपको इस तरह नैतिक उंचाई से निचे गिरकर झूठ असत्य बोलने की अनुमति देती है ? संविधान के रक्षक अगर संविधान कि ऐसी-ऐसी कर रहे हैं, तब उनके इस कृति को असंवैधानिक नहीं कहेंगे तब और क्या कहेंगे?
पुरे आयु कि कमाई इकट्ठा करके अगर उस पुंजी से कोई अपना मकान बांधकर खड़ा करता है और मकान के सामने अपने नाम का बोर्ड लगाता है कि यह मकान उसका है,उस मकान का वह मालिक है। लेकिन,एक दिन गांव का कोई शातिर गुंडा आकर उस मकान मालिक का नाम होने वाले बोर्ड को अपनी दहशत फैलाकर जबरन उस बोर्ड को उखाड़कर फेंक देता है और उसके जगह उस गुंडे के नाम का बोर्ड लगाता है कि वह मकान उसका है। उस गुंडे की यह हरकत संवैधानिक है ? नहीं ना ? क्या यह गुंडागिरी नहीं है? क्या यह चोरी डकैती नहीं है ? है ना ? क्या ये चोरी डकैती करने वाले चोर डकैत नहीं तो और क्या है ? सौ प्रतिशत चोरी डकैती है। तब चौबीस साल अनुसंधान तपस्या करके सबकुछ संपती गंवाकर मैंने खोजी सुभाष पालेकर कृषि तकनीक का बोर्ड उखाड़कर नया प्राकृतिक कृषि या गो आधारित खेती या फुकुओका प्राकृतिक कृषि का नया बोर्ड जबरन लगाने वालों की यह कृति गुंडागिरी चोरी डकैती नहीं है तो और क्या है ? क्या यह उच्चतम भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लक्षण हैं ? इन्होंने खुद को नैतिकता के उंचाई से कितना निचे गिरा दिया है, ख़ुदको इन लोगों ने अपने को बौद्धिक आतंकवादी लोगों के हाथ का खिलौना बनकर उनके पास खुद को गिरवी रखा है ?
यह मेरा तकनीक जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका का प्राकृतिक कृषि है, स्वर्गवासी भास्कर सावे गुरुजी का प्राकृतिक कृषि है, इस तरह का प्रचार अब इन्हीं चोर डकैतों के माध्यम से ये बौद्धिक आतंकवादी बड़े जोर से कर रहे है। यह प्रचार करने वाले उन्हीं बौद्धिक आतंकवादी लोगों के चक्रव्यूह मे खुद को पुरी तरह फंसाकर असंस्कृत मानसिकता को लेकर झूठ असत्य का प्रचार करने लगे लोग हैं। इनको यह मालूम होना चाहिए कि झूठ असत्य बोलने से वाचा सिद्धी चलीं जाती है, फिर आप पर कोई विश्वास नहीं रखता। इस निरंतर चलने वाले झुठे प्रचार को पढ़ कर मुझे बहोत गहरा धक्का लगा। मैं अभी तक विश्वास नहीं कर पा रहा हूं कि जिन व्यक्तियों को मैंने हमारे जन आंदोलन में इतने सालों तक मान सम्मान दिया,नेता बनाया,एक पहचान दियी,वहीं कुछ साथी हमारे जन आंदोलन के साथ धोखाधडी कर रहे हैं। इतना ही नहीं, जो मेरे शिष्य पहले मेरे शिबिर सुनकर हमारे जन आंदोलन में जैविक खेती का घोर विरोध कर रहे थे, उन्होंने अब विदेशी विनाशकारी विध्वंसक जैविक खेती organic farming के प्रचार संस्थान खोले हुए हैं।
जो मेरे कुछ पूर्व मित्र साथी,जिनको मैंने सबसे ज्यादा सन्मान दिया, विश्वासू साथी बनाया था, वे पहले रासायनिक खेती करते थे, उसमें निरंतर आता घाटा देखकर जैविक खेती organic farming करने लगे, जब जैविक खेती माने सजीव खेती में उन्हें रासायनिक खेती से भी ज्यादा घाटा आने लगा तब उन्हें मेरे तकनीक के बारे में जानकारी मिली, तब उन्होंने मेरा शिबीर लिया, सामने बैठकर सुना और पसंद आया, फिर सुभाष पालेकर के कृषि तकनीक की शुरुआत कियी, फायदा होने लगा तब मेरे साथ हमारे जन आंदोलन के साथ जुड़ गए, मेरे अभिन्न शिष्य बन गए, जिससे उनकी देश में एक पहचान बन गई, लेकिन आज वे हमारे जन आंदोलन के साथ बगावत करके सुभाष पालेकर कृषि को गो आधारित कृषि और प्राकृतिक कृषि यह झूठ नाम देकर उसका प्रचार करने लगे हैं, जैविक खेती के विरोध में बोलने वाले ये अब शतप्रतिशत विदेशी जैविक खेती के प्रचार संस्थान स्थापित करने लगे हैं । ये मेरे पूर्व साथी हमारे जन आंदोलन में मेरे शिबिर सुनकर विदेशी जर्सी होल्सटीन गाय और उसके दूध का साथ घोर विरोध कर रहे थे, क्यों कि सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन विदेशी जर्सी होल्सटीन का घोर विरोधी है। आज वे विदेशी गाय और उसके दूध का विरोध करने वाले वे मेरे पूर्व साथी आज उन विदेशी गायों को बड़ी संख्या में पालकर उनका दूध मिठाई लोगों को बेंच रहे हैं।मुंह से प्रचार स्वदेशी गोमाता का लेकिन कृति ठीक विरोधी विदेशी गौशाला को चालू रखने की । कथनी और करनी में कोई तालमेल नहीं है, दुनिया के सर्वोच्च भ्रमित है, खुद को गुमराह कर रहे हैं साथ में देश भी गुमराह हो रहा है । कौन विश्वास करेगा इनपर? ये लोग सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन के सिद्धांतों के ठीक विरोध में प्रचार कर रहे हैं, उन्होने सुभाष पालेकर कृषि के संसाधन बीजामृत जीवामृत घनजीवामृत आच्छादन वाफसा का प्रचार करने का अधिकार खो दिया है। इतना हिमाचल इतना झुठा असत्य प्रचार करने लगे है, कितने झुठे है ये लोग, गलत बौद्धिक आतंकवादी लोगों के संगत में आकर उन्होंने खुद को इतना नैतिक स्तर पर निचे गिरा दिया है, देश के किसानों के मन आत्मा श्रद्धा को इतनी गहरी ठेस पहुंचाई है कि मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो पा रहा है कि क्या यही वे झुठे लोग हैं, जिन्हें मैं मेरे अभिन्न शिष्य मानता था ? मुझे अब बहोत पछतावा हो रहा है कि हमने कितने गलत लोगों को हमारे जन आंदोलन में सन्मान दिया है। हमारे इस ग़लती को हम स्विकार करते हैं और यह गलती दोबारा नहीं होंगी,यह आश्वासन देते हैं।
मैंने जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका की दोनों अंग्रेजी किताबें One Straw Revolution और Natural Way of Farming डाक द्वारा मंगाकर पढी थी, तब मुझे फुकुओका जी की विचारधारा क्या है यह पुरी तरह मालूम हुआ था। उसी दरम्यान मैं पुणे में एक विख्यात मराठी कृषि पत्रिका बलीराजा का सहसंपादक की जिम्मेदारी निभा रहा था। उस 1996- 1997 दरम्यान जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका महात्मा गांधी जी के बारे मे दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में भारत आये थे, तब मेरे मित्र श्री भास्कर सावे जी ने फ़ोन पर बताया कि फुकुओका सावे जी उनके घर आ रहे हैं और वे उनके साथ और मेरे साथ संवाद करना चाहते है। श्री सावे गुरुजी के अनुरोध पर मैं और मेरे पुणे के मित्र श्री भास्कर सावे जी के गांव गये, दो दिन हमारी मासानोबु फुकुओका जी के साथ गहरी बातचीत हुई, उन्होंने वे जापान में क्या करते हैं, उनका कृषि तकनीक क्या है, यह विस्तार से हमें बताया। मैंने उन्हें मेरा कृषि तकनीक क्या है, उसमें मेरे द्वारा खोजित जीवामृत घनजीवामृत आच्छादन वाफसा के बारे में विस्तार से जानकारी दी, श्री भास्कर सावे जी ने उनके कृषि तकनीक गोबर खाद का उपयोग और पेनिसिलिन दवा कंपनी से लायें त्याज्य अवशेषों के आच्छादन के रूप में उपयोग के बारे में उन्हें जानकारी दी। रात को मेरी और फुकुओका की अलग-से मध्यस्थ भाषांतर करने वाले के सहायता से चर्चा हुई,तब उन्होंने कबूल किया कि सुभाष पालेकर की तकनीक को भविष्य में लोग अपने आप स्वीकार करने लगेंगे। उनकी भविष्यवाणी सही थी इसका प्रत्यय आज आ रहा है। जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका अपने संतरा के बगिचा में बड़ी संख्या में मुर्गियां पालते थे ताकि भुमी को मुर्गियों के विष्ठा का खाद मिले और खानें के लिए मुर्गी मिले, बगिचा में उगकर आयें घास खरपतवारों को वे निकालते नहीं थे, वही जगहपर उसके अवशेष गिरने देते थे। उन्होंने कहा था कि उन्हें उनके तकनीक से शुरू के बारह साल संतरा फसल को अच्छा उत्पादन नहीं मिला। अब मैं सुभाष पालेकर कृषि को फुकुओका प्राकृतिक कृषि नाम देने वाले हमारे उन वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकोंको और हमारे पूर्व बगावती साथीयों को खडा सवाल पुंछता हूं कि प्रकृति में माने ईश्वर कि खेती होने वाले घने जंगलों में ईश्वर मुर्गी पालन नहीं करता है, लेकिन जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका मुर्गी पालन संतरा बगिचा में करते थे, मुर्गी विष्ठा के जैविक खाद का उपयोग करते थे, उनके द्वारा लिखित किताबे में उन्होंने यह सब सुस्पष्ट पारदर्शक भाषा में लिखा है, प्रमाण आपके सामने खड़ा है। तब उनका तकनीक प्राकृतिक कृषि Natural farming कैसे हो सकता है? मुर्गी के विष्ठा के खाद का उपयोग करना जैविक खेती organic farming हो गया। ईसका सुस्पष्ट पारदर्शक अर्थ है कि जापानी कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय मासानोबु फुकुओका प्राकृतिक कृषि करते नहीं थे, जैविक खेती organic farming करते थे। क्यों भ्रमित एवं गुमराह किया जा रहा है देश को इन बौद्धिक आतंकवादीयों के द्वारा? फुकुओका जी ने खुद स्वीकार किया कि उन्हें उनके तकनीक से बारह साल तक अच्छा उत्पादन नहीं मिला। कौन माई का लाल किसान है जो बारह साल तक नुकसान सहन कर सकता है? कोई भी नहीं। सच्चाई यह कि फुकुओका के नाम को यां प्राकृतिक कृषि को यां गो आधारित खेती को यां जैविक खेती को वे गिने चुने विद्वान बौद्धिक आतंकवादी लोग उछाल रहें हैं, जिनकी कोई भी खेती नहीं है, खेती कैसे की जाती है इसकी कुछ भी जानकारी उन्हें नहीं है, खेती के बारे में उन्हें कुछ भी अनुभव नहीं है, लेकिन आज वे दुनिया के महान कृषि विशेषज्ञ बन गये है और पुरे दुनिया में अपने नये शतप्रतिशत विदेशी अप्राकृतिक अवैज्ञानिक कृषि कर्मकांड किसानों पर जबरन थोंप रहे हैं, शतप्रतिशत स्वदेशी सुभाष पालेकर कृषि का घोर विरोध कर रहे हैं।
साथियों, स्वर्गवासी भास्कर सावे गुरुजी मेरे गहरे मित्र रहे हैं। जब मासानोबू फुकुओका भारत में सन् 1997 में आये थे तब मैं पुणे में विख्यात मराठी कृषि पत्रिका बलीराजा का सहसंपादक था,तब मेरी फुकुओका जी के साथ मिटींग भास्कर सावे गुरुजी के गांव मे,उनके खेत में घर में हुई थी, तब उस मिटींग में श्री भास्कर सावे गुरुजी ने स्पष्ट कहा था कि वे ( भास्कर सावे गुरुजी) उनके गेहूं दालें और अन्य फसलों मे गोबर खाद डालते हैं और साथ में पड़ोस में होनेवाले पेनिसिलिन दवा बनाने वाले कारखाने में संग्रहित अवशेष उनके चीकू बाग में डालते थे, और धान गेहूं लेने के लिए गोबर खाद का उपयोग करते थे। उन्होंने कभी भी मेरे जीवामृत घनजीवामृत का उनके खेती में उपयोग नहीं किया। भास्कर सावे गुरुजी बहोत ही सत्यवादी थे। उन्होंने जो कहा हमने और मेरे साथ पुणे से आये मित्रोंने वह सब सावे गुरुजी के खेत मे देखा भी। वास्तव में सावे गुरुजी उनके खेती में परंपरागत जैविक खेती खेती करते थे, लेकिन इस तकनीक को वे प्राकृतिक कृषि कहते थे। उन्होंने मेरे कृषि तकनीक को हर बार सुभाष पालेकर का ही तकनीक कहा है, ऐसा कई बार दोहराया है।
साथियों, हम जब मासानोबु फुकुओका जी के साथ हुएं मेरे मीटिंग के लिए स्व भास्कर सावे गुरुजी के गांव गये थे, तब हमारे मिटींग के बाद मैं बलीराजा पत्रिका के हमारे मुख्य संपादक श्री भोंसले जी के अनुरोध पर मै भास्कर सावे गुरुजी के गांव मे गया , वहां उनके खेत में उनके घर तीन दिन रहा और उन तीन दिनों में मैंने भास्कर सावे गुरुजी का एक दीर्घ साक्षात्कार माने इंटरव्यू लिया, जो बादमें बलीराजा पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जिसे हजारों किसानों ने पढ़ा,उन पढ़ने वाले किसानों को भी मैं उचित समय पर मिडिया के सामने खड़ा करुंगा और वह इंटरव्यू होनेवाले मासिक के अंक को भी मिडिया के सामने रखूंगा।
उस इंटरव्यू में माने साक्षात्कार में भास्कर सावे गुरुजी खुद कहते है कि वे उनके धान गेहूं के खेत में गोबर का खाद डालते हैं और चिकू के बगिचे में कोई भी खाद या कल्चर नहीं डालते, बल्कि पड़ोस के पेनिसिलिन दवा बनाने वाले कारखाने में संग्रहित अवशेष चिकू के खेत में डालते हैं। उनके पुरे इंटरव्यू में उन्होंने कहीं भी नहीं लिखा कि वे मेरे द्वारा खोजित जीवामृत डालते हैं। इस बढ़िया इंटरव्यू के लिए भास्कर सावे गुरुजी ने पुणे में आकर मेरा सत्कार किया और मुझे 5000 रुपये की सत्कार राशि प्रदान कियी। यह सारा इतिहास मै ठीक समय पर मिडिया के सामने रखने जा रहा हूं।
मेरे सन्माननीय झुठे मित्रों , किसी पर झुठे आरोप लगाकर उसकी बदनामी करना भारतीय संविधान के अनुसार गुनाह है, और भारतीय संस्कृति के अनुसार उच्च कोटी की असभ्यता है,पशुता है, अमानवीयता है। जीन गलत बौद्धिक आतंकवादी लोगों के संगत में आकर आप यह गुनाह कर रहे हो, वे सौ प्रतिशत स्वदेशी होनेवाली सुभाष पालेकर कृषि SPK नहीं चाहते, वे सौ प्रतिशत विदेशी होने वाली विनाशकारी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक जैविक कृषि organic farming चाहते हैं, जिसने पडोसके श्रीलंका को बर्बाद किया ,अब हमारे पवित्र भारत माता को बर्बाद करेगी। इन लोगो के द्वारा इस ख़तरनाक विदेशी जैविक एवम् प्राकृतिक कृषि organic and natural farming तकनीक के नये अनुसंधान संस्थान खोले गए हैं। यह अच्छा हुआ, अब हमारे किसानों के सामने उनकी सही प्रतिमा स्पष्ट हुई, आपने स्वयं ही सिद्ध किया की आप सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन के उच्च कोटी के विरोधक है, मुंह में स्वदेशी का जाप करते हैं, लेकिन शतप्रतिशत खतरनाक विदेशी जैविक खेती का प्रचार करते हैं, जो दुनिया में कहीं भी अस्तित्व में नहीं है उस झुठे असत्य प्राकृतिक कृषि का नाम मेरे तकनीक को देकर तकनीक चोरी करते हैं, इससे आप स्वयं सिद्ध कर रहे हैं कि आपका हमारे सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन से अब कोई भी संबंध नहीं है।
इन झुठे लोगों ने मेरे निरंतर विरोध के बावजूद मेरे नाम का उपयोग करके एक संस्था का गठन किया। जब मुझे मालूम पड़ा तब मैंने आप तिनों को फोन करके उस संस्था को बर्खास्त करने को कहा, लेकिन इन्होंने अभी तक इसे बर्खास्त नहीं किया। यह गुरु द्रोह है। हमारा जन आंदोलन है, संगठन नहीं है, संगठन में राजनीति और भ्रष्टाचार प्रवेश करता है और संघठन बदनाम हो जाता है। मैने ऐसे कई संगठनों को बनते और बिखरते देखें है। हमारा सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन इस संस्था का पुरा विरोध करता है, और हम घोषित करते हैं कि आपके इस संस्था से हमारे जन आंदोलन का कोई भी संबंध नहीं है।
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