पद्मश्री डॉक्टर सुभाष पालेकर का आह्वान

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर

व्हाट्स एप नं 9850352745

Mail id.. palekarsubhash@yahoo.com

ता 4 अक्टूबर 2023 बुधवार

विषय .... कोई भी खाद पेड़ पौधों का भोजन होता है इसलिए उसे भुमी मे डालना ही पड़ता है,यह विदेशी हरित क्रांति का और देशी विदेशी गो आधारित खेती और जैविक खेती के प्रचारकों का दावा शतप्रतिशत झूठ हैं, असत्य है, छलावा है। कैसे? 


साथियों और बहनों,

जिन्होंने मेरा शिबीर सुना नहीं, मेरे द्वारा लिखित किताबें पढी नहीं वे सारे किसान साथी, कृषि वैज्ञानिक, गैरसरकारी संगठन, सामाजिक संगठन, किसान संगठन और कृषि विद्यार्थी उप्पर के विषय का शीर्षक पढ़कर मेरे बारे में अपनी प्रतिक्रिया तुरंत प्रस्तुत करेंगे कि सुभाष पालेकर जी क्यों इस तरह का उल्टा सीधा झूठ कहकर हमें बिजली के झटके देते रहते हैं? साथियों, मैं सर्वप्रथम एक स्पष्टीकरण देना मेरा कर्तव्य समझता हूं कि डॉ सुभाष पालेकर जी जो भी बोलते हैं वह सौ प्रतिशत सत्य होता है,इस के बारे में जो भी साथी आशंका व्यक्त करते हैं उन्हें जाहिर आवाहन है कि वे वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध करें कि डॉ सुभाष पालेकर जी झूठ बोलते हैं।

      साथियों ,मेरा खुल्लम खुल्ला सत्य दावा यह है की कोई भी खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं होता है, इसलिए भुमी मे उसे डालने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है,चाहे वह खाद विदेशी अफ्रीकन गो आधारित परंपरागत खेती का गोबर खाद हो, यां विदेशी हरित क्रांति का रासायनिक खाद हो यां युरोप अमेरिकन विदेशी जैविक खेती organic farming का कंपोस्ट खाद वर्मी एवं कंपोस्ट खाद हो, यां न्यूजीलैंड का बायोडायनैमिक खाद हो, यां मध्य एशिया के वैदिक कृषि का पंचगव्य खाद एवं अग्नि होत्र कृषि तंत्र हों, यां कोई खल्लियां oil cakes हों यां बाजार में मिलने वाले कोई भी मानव निर्मित खाद हों। आजतक के वैश्विक कृषि इतिहास में जितने भी मानव निर्मित कृषि तकनीक किसानों पर थोंपे गये है,उन सबका दावा है कि सभी खाद‌ पेड़ पौधों का भोजन होता है, इसलिए भुमी में खाद डालना ही पड़ता है, नहीं डाले तो फसलें बढ़ती नहीं और उत्पादन मिलता नही। दुनिया के कृषि इतिहास में डॉ सुभाष पालेकर पहला अनपढ़ किसान है कि जो खुलेआम दावा कर रहे हैं कि कोई भी मानव निर्मित खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं है, पेड़ पौधों के वृद्धि विकास में और उनका उत्पादन मिलने में मानव की कोई भी भुमिका नहीं है, पेड़ पौधों का विकास ईश्वर द्वारा रचित एक स्वयं चलित मानवरहित अद्भुत स्वयं विकासी स्वयं पोषी स्वावलंबी व्यवस्था से होता है, जिसमें मानव का अस्तित्व कहीं भी नहीं है। जब मैं यह दावा करता हूं,तब मेरा नैतिक संवैधानिक एवं आध्यात्मिक दायित्व बनता है कि मैं मेरे इस दावे को वैज्ञानिक आध्यात्मिक कसौटियों पर सिद्ध करूं।

    साथियों, पृथ्वी पर खड़े किसी भी पेड़ पौधे की यां खड़ी हरी फसल की कटाई करें और तुरंत उसका भार किजिए, समझिए वह भार 100 किलो है। अब काटे गए सौ किलो हरे फसल अवशेषों green biomass को किसी सीमेंट कांक्रीट के फर्श पर पतले स्तर में फैलाकर कड़ी धूप में उन्हें इतना सुखाइए की उस  सुखे अवशेषों के अंतिम दो भार एकसमान आयेंगे। पुरी तरह सुखने के बाद उनका भार किजिए, आपको वह भार मिलेगा 22 से लेकर 25 किलो। हमने कूल 100 किलो कटी हरी फसल लियी थी, सुखने के बाद वह 22 से 25 किलो बची, माने 75 से 78 किलो भार घटा, माने सुखते समय उस हरी फसल अवशेषों में से वह हवा में निकल गया। क्या निकल गया? पानी निकल गया। क्यों कि किसी भी फसल अवशेषों को हम सुखाते हैं तब बाष्प उत्सर्जन trans evaporation क्रिया से उनमें से पानी का अंश हवा में उड़ जाता है। माने यह सिद्ध हुआ कि खडे पेड़ पौधों के यां खड़े फसल के शरीर में उनके कूल हरे जैव भार green biomass में 75 से लेकर 78 प्रतिशत पानी होता है। भारत में आज भी 72 प्रतिशत भूमि और तमाम जंगल वर्षाधारित असिंचित है, वहां कोई भी मानवीय सिंचाई नहीं है। इन विशाल स्तर के वर्षाधारित असिंचित पेड़ पौधों के जड़ों को जो पानी मिल रहा है वह मानसून के द्वारा मिल रहा है। क्यों कि वहां कहीं भी मानवी सिंचाई नहीं है।मानसून हिंद महासागर से, बंगाल के उपसागर से और अरबी समुंदर से अपने साथ लाये अनंत जलसंपृक्त घने बादलों के माध्यम से बाष्प रुपी समुन्दर जल भारत में लाता है और हमारे भुमी को उस वर्षा जल से सिंचित करता है ,वह वर्षा जल भुमी अंतर्गत भू-जल भंडार में संग्रहित होता है, कुओं में, नलकूपों में, तालाबों में और बांधों dam के जलभंडारो में संग्रहित होता है,तब उन जल स्त्रोतों के माध्यम से असिंचित यां सिंचित पेड़ पौधों के एवं फसलों के जड़ों को और हमें पिने के लिए, कारखानों को वह पानी उपलब्ध होता है। ईश्वर  निर्मित इस मानसून के अद्वितीय अलौकिक अद्भुत अनगिनत जलसंमृदध घने बादलों के रुप में बिछाई गई ईश्वर निर्मित मानव रहित पाईप लाईन के माध्यम से समस्त सजीव सृष्टि को पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। इस प्राकृतिक जल आपूर्ति व्यवस्था में मानव कहा है? सत्य यह की इस जल आपूर्ति व्यवस्था में मानव का कहीं भी अस्तित्व नहीं है। जो किसान अपने फसलों को कुआं well मे से यां नलकुपो tube well में से यां तालाब में से यां नदी में से यां सिंचाई कैनल माने नहरों में से पानी निकाल कर फसल को सिंचाई करते हैं, उस पानी को मानव ने निर्माण नहीं किया है, मानव की वह क्षमता हैसियत नहीं है,वह तमाम पानी मानसून के मेघों द्वारा वर्षा जल के रूप में लाकर दिया गया होता है। जब मानसून नहीं बरसता तब भयावह अकाल‌ सुखा होता है, कुआं नलकूप तालाब बांध dam सारे सुख जाते हैं।‌ ईसका सुस्पष्ट पारदर्शक अर्थ है कि पेड़ पौधों के शरीर विकास के लिए आवश्यक पानी के आपूर्ति व्यवस्था में मानव का कुछ भी अस्तित्व नहीं है,उसकी कोई भी भूमिका नहीं है। भुमि में से जड़े जब पानी को उठाती है,तब वे जड़ें किसी सरकार की अनुमति नहीं लेती यां किसी मानव की सहायता नहीं लेती।‌ 

     अब सुखने के उपरांत बचें 22 किलो से लेकर 25 किलो सुखे फसल अवशेषों का सिमेंट कांक्रीट के फर्श पर ढेर‌ लगाकर उन्हें जलाइए। जलते समय दो घटनाएं घटित होती है, काला धुआं निकलता है और ज्वालाएं निकलती है। यह काला धुआं माने उड़कर जाने वाला काला कार्बन है, जिसको पेड़ पौधों के हरे पत्तों ने प्रकाश संश्लेषण क्रिया photo synthesis process के दरम्यान उनके पर्न छेदों stomata में से सिधा हवा में से करबाम्ल वायु carbon dioxide के रूप में लिया होता है और पतों में उसे संग्रहित किया है। अब हरे पत्ते उसी प्रकाश संश्लेषण क्रिया के माध्यम से सूरज के रोशनी में से प्रति वर्ग फुट हरा पत्ता एक दिन में 12.5 किलो कैलोरी सौर ऊर्जा को सोख लेते हैं और‌ उसे हरे पत्तों में होनेवाले सौर ऊर्जा संग्राहक घटो  Adenosine Tri Phosphate ATP मे‌ संग्रहित करते हैं। अब इस सौर ऊर्जा का हरे पत्तों में रासायनिक ऊर्जा में रुपांतरण होता है। यह रासायनिक ऊर्जा हवा से लिए इन करबाम्ल वायु के रेणुओं carbon dioxide molecules का विच्छेदन करके उसमें होने वाले कार्बन के अणुओं को और प्राणवायु oxygen के अणुओं को एक दुसरे से अलग करतें हैं, उस अलग हुए प्राणवायु को तुरंत हमारे मानव‌ के और तमाम वायु जीवी aerobic सजीव सृष्टि के श्वसन क्रिया respiration के लिए पतों द्वारा होने वाले पेड़ पौधों के श्वसन क्रिया के द्वारा  हवा में छोड़ा जाता है, ताकि हवा में 21 प्रतिशत प्राणवायु के मात्रा का संतुलन बनाए रखें। अब पतों में संग्रहित रासायनिक ऊर्जा प्रकाश संश्लेषण क्रिया के माध्यम से हरे पत्तों में संग्रहित कार्बन का जड़ों के द्वारा पतों में भेजें गये पानी के साथ रासायनिक संयोग करके हरे पत्ते प्राथमिक शर्करा माने कर्बोदक माने कार्बोहाइड्रेट carbohydrates का संश्लेषण करके निर्मिती होती हैं।‌ एक वर्ग फुट हरा पत्ता प्रकाश संश्लेषण क्रिया के माध्यम से एक दिन में इस तरह 4.5 ग्राम कच्ची शर्करा माने कार्बोहाइड्रेट की निर्मिती करतें हैं, उसमें से हमें 1.5 ग्राम अनाज की उपज यां 2.25 ग्राम फलों की एवं गन्ना की उपज मिलती है।

      बादमें अब हरे पत्तों को इस कच्ची शर्करा का माने कार्बोहाइड्रेट का रुपांतरण विविध प्रकार के 20 अमीनो अम्लो  amino acids में करना है, उसके लिए हवा में से लिया नत्रवायू माने नायटरोजन nitrogen चाहिए, उस नायटरोजन को हवा में से लेकर पेड़ पौधों के जड़ों को उपलब्ध करने का ठेका ईश्वर ने बिना कुछ कमीशन लेने वाले बिना किसी भ्रष्टाचार को करने वाले सहजीवी नत्र स्थीरक सूक्ष्म जीवाणूओं symbiotic nitrogen fixing bacteria और असहजीवी नत्र स्थीरक सूक्ष्म जीवाणूओं को non symbiotic nitrogen fixing bacteria को दिया है, किसी भी मानव‌ को इस ठेके को ईश्वर ने नहीं दिया है। क्यों मानव को यह ठेका ईश्वर ने नहीं दिया है? क्यों कि ईश्वर इस संपूर्ण सत्य से पुरी तरह आश्वस्त हैं कि यह मानव इस व्यवहार में जरूर कमिशन लेकर भ्रष्टाचार करेगा।‌ आजकल ईश्वर को दुराचारी एवं भ्रष्टाचारी‌ मानव का  बहुत डर‌ लग रहा है।‌ हवा में 78 % नत्र माने नायटरोजन होता है, माने हवा इस अमूल्य नायटरोजन का महासागर है। जब हरे पत्तों को अमीनो एसिड्स के निर्माण के लिए आवश्यक नायटरोजन की और कुछ आवश्यक खनिज तत्वों की आवश्यकता होती है तब हरे पत्ते व्हाट्स एप से या फेसबुक के माध्यम से जड़ों को संदेश message भेजते हैं कि हमें नायटरोजन और खनिज तत्व चाहिए, उसे तुरंत भेजिएगा। इस संदेश को मिलते ही जडें तुरंत इस मेसेज को सहजीवी और असहजीवी नत्र स्थीरक सूक्ष्म जीवाणूओं को और दुसरे रुपांतरकारी सुक्ष्म जीवाणुओं को फारवर्ड करते हैं। सजीव होने वाले उर्वरा भुमी मे होने वाले दोनों नत्र स्थीरक सूक्ष्म जीवाणु जड़ों के द्वारा भेजा संदेश मिलते ही दोनों मिलकर हवा में से नायटरोजन को सोंखते है और जड़ों को देते हैं ,साथ में अनुपलब्ध स्फुरद माने फाॅस्फरस को पकाकर उपलब्ध स्थिति में रुपांतरण करके जड़ों को उपलब्ध करने वाले फाॅस्फरस रुपांतरकारी सुक्ष्म जीवाणू phosphate solubalising bacteria, साथ में अनुपलब्ध non available पालाश माने पोटैशियम का रुपांतरण उपलब्ध पोटैशियम में करने वाले पोटैशियम रुपांतरकारी सुक्ष्म जीवाणू बैसिल्लस सिलीकस Bacillus silicus जैसे सूक्ष्म जीवाणूओं की प्रजातियां,और इस तरह हर अनुपलब्ध खनिजों का रुपांतरण उपलब्ध स्थिति में करने वाले अनंत सूक्ष्म जीवाणूओं द्वारा अनुपलब्ध खनिजों non available minerals को पकाकर उपलब्ध स्थिति available stage में रुपांतरित करके पकायें हुए आवश्यक सभी खनिज तत्वों को जड़ों को उपलब्ध करने के ईश्वर निर्मित व्यवस्था के माध्यम से जड़े भुमी में से नायटरोजन और खनिज तत्वों को सोंखती  है, जडें उन्हें तुरंत हरे पतों को बिना कोई कमीशन लिए एवं बिना किसी भ्रष्टाचार किये भेज देते है । फीर हरे पत्ते संग्रहित रासायनिक सौर ऊर्जा के माध्यम से कार्बोहाइड्रेट्स के साथ इस पानी का और खनिजों का रासायनिक संयोग करके 20 प्रकार के अमीनो एसिड्स की निर्मिती करतें हैं। बादमें कुछ अमीनो एसिड्स एकसाथ मिलकर प्रथिनों की मानें प्रोटीन की निर्मिती करतें हैं।हरे पत्तों द्वारा इस प्रोटीन को पेड़ पौधों के शरीर में संग्रहित किया जाता है , जिससे पेड़ पौधों के शरीर का आकार बढ़ता है,जिसे हम पेड़ पौधों की यां फ़सल की वृद्धि growth कहते हैं। 

      अब दुनिया के तमाम विदेशी हरित क्रांति का गुणगान करने वाले कृषि वैज्ञानिकों को, विदेशी विनाशकारी विध्वंसक जैविक खेती organic farming का प्रचार एवं गुनगान करने वाले मित्रों को, विदेशी अफ्रीकी गो आधारित खेती का प्रचार एवं गुनगान करने वाले मित्रों को, यां अन्य मानव द्वारा विकसित कृषि तकनीकों का प्रचार करने वाले मित्रों को हमारे सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन का खड़ा सवाल है कि इन पेड़ पौधों के शरीर वृद्धि विकास क्रिया में कहां मानव का अस्तित्व है, कहा मानव की प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष भूमिका है? दिखाओ? सत्य यह है कि कहीं भी मानव उपस्थित नहीं है।

       ईश्वर ने पहले वनस्पति पेड़ पौधों को पृथ्वी पर भेजा और उसके लाखों सालों के बाद मानव को पृथ्वी पर भेजा। फिर मानव आने के पहले यां आज भी घने जंगलों को और सुभाष पालेकर कृषि करने वाले फसलों को कौन खाद डालता है? कोई भी नहीं।‌ इस ईश्वरीय व्यवस्था में कोई भी मानव पहले भी उपस्थित नहीं था और आज भी नहीं है। क्यों दुनिया को गुमराह कर रहे हों भाई,यह दावा करके की खाद पेड़ पौधों के जड़ों का भोजन होता है ?

       दुनिया के किसी भी मानव रहित घने जंगलों में खड़े किसी भी पेड़ पौधे के यां सौ प्रतिशत सुभाष पालेकर कृषि करने वाले किसानों के फसलों के पत्ते तोड़े और दुनिया के किसी भी अत्याधुनिक प्रयोगशाला में उनका सूक्ष्म परिक्षण करें, आपको उन पतों में किसी भी खाद्य तत्व nitrients की कमी deficiency नहीं मिलती। उस घने जंगल में मानव का अस्तित्व नहीं है, अर्थात किसी भी मानव निर्मित खादों का उपयोग उन जंगलों में और सुभाष पालेकर कृषि करने वाले फसलों में नहीं किया गया है, तब भी उन फसलों में खनिजों की या नायटरोजन फास्फोरस पोटैशियम की कमी बिल्कुल नहीं है। अगर कृषि वैज्ञानिक दावा करते हैं कि पेड़ पौधों के शरीर विकास के लिए आवश्यक खाद्य तत्व भुमी मे नही होते, उन्हें खाद के रूप में हरसाल भुमी मे डालना ही पड़ता है, तब घने जंगलों में यां सुभाष पालेकर कृषि करने वाले लाखों किसानों के फसलों में उन खाद्य तत्वों की कमी क्यों नहीं है? इसका वैज्ञानिक कसौटियों पर टिकने वाला जवाब कृषि वैज्ञानिकों देना चाहिए।   इसका अर्थ सुस्पष्ट पारदर्शक सत्य है कि यह सत्य इन वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध होता है कि कोई भी मानव निर्मित खाद किसी भी पेड़ पौधे के जड़ों का भोजन नहीं है।‌

      घने जंगलों के पेड‌ पौधो के और सुभाष पालेकर कृषि करने वाले लाखों किसानों के फसलों में किसी भी खाद्य तत्व की कमी नहीं है, इसका अर्थ यह है कि उन सारे खाद्य तत्वों की आपूर्ति वे पेड़ पौधे जींस भुमी मे  खडे हैं,उसी भुमी मे से हो रही है, माने वह भुमी उन खाद्य तत्वों का महासागर है, उप्पर से किसी भी बाहरी खाद को डालने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। सुभाष पालेकर कृषि में इन सभी उपयुक्त रुपांतरकारी सुक्ष्म जीवाणुओं का एकमेव अद्वितीय अलौकिक अद्भुत सर्वोत्तम जामन culture होने वाले जीवामृत घनजीवामृत के माध्यम से इन उपयोगी अनंत करोड़ सूक्ष्म जीवाणूओं को भुमाता में छोड़े जाते हैं, भुमी मे उनके कोशिकाओं के विभाजन क्रिया cell division के माध्यम से उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगती है, भुमी जीवाणू समृद्ध सजीव बनती है और ये जीवाणु भुमी मे होने वाले सभी अनुपलब्ध खाद्य तत्वों का पकाकर रुपांतरण उपलब्ध स्थिति में करके पेड़ पौधों के जड़ों को उपलब्ध करते हैं। सुभाष पालेकर कृषि का जीवामृत घनजीवामृत साधन खाद नहीं है, गलती से भी उसे खाद नहीं कहना है,बल्कि जीवामृत घनजीवामृत दोनों अनंत करोड़ उपयुक्त सूक्ष्म जीवाणूओं का अद्वितीय अलौकिक अद्भुत जामन culture है। साथियों, अपने दिमाग़ में से, पुरे दुनिया में से खादों का अस्तित्व समाप्त किजिएगा। क्यों? क्यों कि कोई भी खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं है,इस पारदर्शक सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा। आगे वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन से होने वाले और अभी हों रहें विनाशकारी विध्वंसक परिणामों को टालकर सजीव सृष्टि को विनाश से बचाना है तो यह आपकों करना ही पड़ेगा। वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले हरित गृह वायुओं के उत्सर्जन में रासायनिक खादों का, गोबर खाद का, कंपोस्ट खाद का, वर्मी कंपोस्ट खाद का, अखाद्य खल्लियों का और अन्य सभी जैविक खादों का अधिकतम हिस्सेदारी है। सुभाष पालेकर कृषि में इन हरित गृह वायुओं green house gases के उत्सर्जन का सवाल ही पैदा नहीं होता है, क्यों कि मेरे इस तकनीक में कोई भी खाद डाला नहीं जाता। इसलिए मैं सभी कृषि वैज्ञानिकों को, सरकारों को, गैरसरकारी संगठनों को, सामाजिक संगठनों को और तमाम किसान संगठनों को विनम्र अनुरोध करता हूं कि कृपया आप इस मूलभूत विज्ञान को समझिए, विज्ञान को मत नकारिए, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए यह बहुत आवश्यक है। 

    आपसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि आप इस पोस्ट को सर्वत्र फारवर्ड किजिएगा। धन्यवाद।

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