हिंदू होने का अर्थ

 

हिंदू का अर्थ

हिंदू शब्द का अर्थ धर्म के रुप में बताया जाय या सम्प्रदाय के रुप में, लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना होते हुए भी इस शब्द के अर्थ की पहचान मात्र एक भूगोल पर हीं आधारित है। आज के प्रचलित किसी भी धर्म के इतिहास से हिंदू का इतिहास ज्यादा पुराना है। हिंदू के ज्ञात इतिहास पर गौर करें तो, यह शब्द लगभग आज से 3000 (तीन हजार) वर्ष पहले का मालूम होता है। हिंदू धर्म या सम्प्रदाय की जड़ में मुख्यतः अखण्ड भारत के भूगोल और उसके इतिहास के साथ साथ सनातन परम्परा और विश्वास भी निवास करती है।

ज्ञात साक्ष्य और तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदू शब्द की उत्पति पन्द्रह सौ ईसा पूर्व से तेईस सौ ईसा पूर्व की सनातन सभ्यता-संस्कृति के आधार पर हुई थी। इस तरह से आज दुनिया के किसी भी अन्य प्रचलित धर्म से भी ज्यादा पहले का इतिहास हिंदू का हीं ज्ञात होता है।

वास्तव में हिंदू को भले हीं आज एक धर्म के रुप में मान लिया गया हो लेकिन यह भारत में जितने भी धर्म हैं सबको अपना मानने और आदर देने के लिए भी जाना जाना चाहिए। क्योंकि हिंदू भले हीं आज एक धर्म के रुप में जाना जाता है, लेकिन यह वास्तव में सभी धर्मों के लोगों को एक सार्वभौमिक धार्मिक नजरिए से हीं देखता आया है। इसी नाते यह किसी भी एक धर्म से कहीं ज्यादा बढ़कर एक पूरे संप्रदाय के रुप में नजर आता है।

एक सच्चा हिंदू किसी भी धर्म के खिलाफ द्वेष की भावना नहीं रखता। एक सच्चा हिंदू केवल अपने धर्म को हीं श्रेष्ठ नहीं बताता है, बल्कि सभी धर्मों का एक समान आदर करता है। तथा सभी के भावनाओं के प्रति एक आदर का भाव भी रखता है। हिंदू के ज्ञात इतिहास पर गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका मत कई मतों के साथ एक समान तालमेल बनाकर चलने की ताकत भी अपने पास रखता है।

इसलिए हिंदू को आज एक धर्म से आगे बढ़कर सम्प्रदाय के रुप में भी देखा जाता है। जबकि धर्म और सम्प्रदाय का अर्थ अलग अलग होता है। हिंदू का अर्थ हिंदुस्तान के मूल निवासी के रुप में बताया जाता है। लेकिन हिंदुस्तान में आज हिंदू के अलावां भी कई धर्मों के लोगों को यहां के निवासी के रुप में या नागरिक के रुप में स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है।  

कालांतर में अखणड भारत से निकलकर कई अलग अलग देश बनते चले गए। लेकिन अगर हम यहां यह बात लिख दें कि आज भी हिंदुस्तान के जितने भी नागरिक हैं सभी हिंदू हैं, तो एक हो हल्ला मचना भी स्वाभाविक है। जबकि यह बात तथ्यों के आधार पर पूरी तरह से साबित होती है, कि सिंधु नदी घाटी में रहने वाले लोगों की सभ्यता-संस्कृति की पहचान बताने की वजह से हीं सबसे पहले हिंदू शब्द की उत्पत्ति भी हुई है।

इस तरह से हिंदू शब्द के पहचान की उत्पत्ति एवं जन्मस्थान सिंधु नदी घाटी में रहने वाले लोगों की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति की पहचान बताने से हीं जुड़ी हुई है। सिंधु नदी घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता लगभग  पांच हजार वर्ष ईसा पूर्व की थी जो लगभग तेईस सौ से दो हजार ईसा पूर्व तक उपने चरम पर पहुंच चुकी थी।

लेकिन इस तरह की बातों के खिलाफ भी जब कोई शोर मचाता है और वह भी वैसा व्यक्ति जो हिंदुस्तान की नागरिकता लिए होता है, तो फिर यह एक आश्चर्य की बात भी होती है। आश्चर्य की बात है आखिर हमारे बीच ऐसी विचारों को जो कई साक्ष्य और तथ्यों के आधार पर हमारे ज्ञात इतिहास का भी विरोध कर रहे हैं, उनकी बातों को भी इतनी क्यों महत्व दी जा रही है।  

हिंदू एक ऐसी सभ्यता-संस्कृति का नाम है जो सिन्धु नदी के किनारे से विकसित होकर आज पूरी दुनिया में पहुंची है। यह अलग बात है कि कालांतर में बहुतों ने कई अन्य जगह पर जाकर वहां के सभ्यता-संस्कृति को भी बाद में अपनाया, हिंदुस्तान से निकलकर कई अलग अलग देश भी बनते रहे, और कई लोगों ने हिंदुस्तान में रहते हुए भी किसी अन्य सभ्यता-संस्कृति को अपनाये।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि सनातन हीं इन सभी बातों का विरोध करता है। बल्कि, यहीं सभी बातें हमेशा से सनातन की पहचान बनी हैं। सनातन का विरोध भले हीं दुनिया के लोग करते हैं, लेकिन सनातन पुरी दुनिया के लोगों को अपने एक कुटुम्ब के समान हीं आज भी देखता है।

इसी वजह से हिंदुस्तान में या हिंदुस्तान के बाहर के अन्य देशों में रहते हुए भी कई अपने आप को आज हिंदू हीं मानते हैं। भले हीं उनकी नागरिकता अब हिंदुस्तान की नहीं रही। लेकिन वह कभी न कभी हिंदुस्तान का मूल निवासी भी रहा है। यहां के सभ्यता-संस्कृति का पालन करता रहा है, इसलिए वह अपने आप को आज भी एक हिंदू हीं मानता है। एक सच्चे हिंदू के मन-मस्तिष्क में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना पूरी दुनिया के अंदर समझी जा सकती है।

वास्तव में हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि एक ऐसा सम्प्रदाय है, जो दुनिया के सभी धर्मों और मतों के प्रति अपना आदर व्यक्त करता आया है। विशेषकर भारत के हिंदुओं और इंडोनेशिया के मुस्लिमों के जीवन-शैली और उनके सामाजिक मान्यताओं को देखकर इन सब बातों को बहुत हद तक आज भी समझा जा सकता है।    

आज भले हीं हिंदुस्तान भौगोलिक दृष्टि से बंटते हुए पहले के मुकाबले एक छोटे से देश के रुप में सिमट कर रह गया है। लेकिन इसके वर्तमान को देखते हुए इसके अतीत और वास्तविकता को हीं नहीं भूला दिया जाना चाहिए।

अगर आज से लगभग 3 हजार वर्ष पहले के इतिहास पर हम गौर करें और उससे भी कुछ हजार वर्ष पहले के ज्ञात इतिहास की सभ्यता-संस्कृति या जब बाद के अखण्ड भारत में जो धर्म थी, जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं तो उनके बीच भी बहुत सी बातों को लेकर मतभेद रहते थे।

एक या दो बार नहीं सैकड़ों बार एक दूसरे के खिलाफ युद्ध की भी बातें आते रही हैं। कुल मिलाकर  सनातन धर्म की व्याख्या से यहीं बात स्पष्ट होती है कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला होता है। कोई व्यक्ति स्वयं जिसे धारण करने योग्य समझे वहीं उसका धर्म है। इस तरह से सभी धर्म एक समान अहमियत और हैसियत के हीं हैं। 

इसलिए जब हम हिंदू की बात करते हैं तो इसे केवल सनातन के साथ हीं जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि पहले की तरह हीं आज भी हिंदुस्तान के हरेक निवासी को हिंदू हीं मानकर चलना चाहिए। क्योंकि हिंदू शब्द की पहचान आज भले हीं एक धर्म के रुप में हीं की जाती हो, लेकिन वास्तविक रुप में हिंदू का अर्थ हिंदुस्तान के निवासियों के भौगोलिक पहचान से हीं जुड़ी हुई  है।  

जब जब किसी भी धर्म की बात, किसी का भी एक व्यक्तिगत मामला नहीं होकर और सामुदायिक रुप से प्रकट होती है, तो कहीं न कहीं हम उन सबकी बातों में एक भारी आडम्बर भी देख सकते हैं। आज हीं नहीं बल्कि यह आडम्बर युगों युगों से चलती आई है। यह बात सभी धर्मों के साथ जुड़ी हुई है।

इसलिए मै यहां किसी धर्म के आधार पर हिंदू की नहीं, बल्कि भौगोलिक रुप से अपने आप को हिंदू नहीं मानने वाले और हिंदू मानने वाले उन लोगों की बात कर रहा हूं, जो भारत में रहते हैं या भारत के बाहर किसी दूसरे देश में रहते हुए भी अपनी मूल सभ्यता संस्कृति के अनुसार अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं।

आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा हिंदू हिंदुस्तान में निवास करते हैं। प्राचीन भारत या अखण्ड भारत की बात की जाए तो सबसे ज्यादा मुस्लिम भी आज के भारत और अखण्ड भारत से निकलकर बने हुए देशों के बीच हीं रहते हैं।

इसलिए हिंदू की तुलना किसी भी वैसे धर्म के साथ करने से बचना चाहिए जो हिंदू को केवल एकेश्वरवादी या एक हीं धर्म के नजरिए से देखते हैं। हिंदू की सोच-समझ, सभ्यता-संस्कृति और भौगोलिक पहचान हमेशा वसुधैव कुटुम्बकम की सोच पर हीं आधारित रही है, और आज भी है।  

हिंदू के विचार में कभी भी किसी एक का हित नहीं है, बल्कि इसके विचार में सबका हित है। हिंदू के विचार में सबका समान हित है। हिंदू एकेश्वरवादी भी हो सकता है और एकेश्वरवादी नहीं भी हो सकता है। हिंदू आस्तिक भी हो सकता है तथा हिंदू नास्तिक भी हो सकता है। किसी का भी हिंदू होना धार्मिक नहीं भौगोलिक दृष्टि की बात है।

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