लेख- पद्मश्री डॉक्टर सुभाष पालेकर

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर

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ता 24 सितंबर 2023 रविवार

विषय .. आत्मनिर्भर भारत की निर्मिती संघठन के द्वारा नहीं, सिर्फ जन आंदोलन के द्वारा ही संभव है। कैसे? 


साथियों और बहनों,

कोई भी स्वयं सेवी संगठन हो, यां गैरसरकारी संगठन NGO हो यां सामाजिक संगठन यां आध्यात्मिक संगठन जो गैरसरकारी संगठन के तौर पर गठित किए गए हो, ये सारे संगठन बाहरी आर्थिक सहायता पर चलते हैं, चाहें वह आर्थिक सहायता देने वाले देशी विदेशी आर्थिक सहायताकार माने फंडिंग एजेंसी हो, यां किसी उद्योग समूह का सामाजिक दायित्व निधि corporate social responsibility fund CSR हो यां सरकारी आर्थिक सहायता हो यां अन्य आर्थिक स्त्रोत हो। माने ये संगठन सदा के लिए बाहरी आर्थिक सहायता पर ही निर्भर होते हैं, परिणाम स्वरूप कुछ अपवादों को छोड़कर उन्हें आर्थिक सहायता करने वाले संस्थाओं के शर्तों पर ही चलना पड़ता है, जिससे उन्हें खुद के आदर्शों पर और रचनात्मक सृजनात्मक निती पर चलना सर्वथा असम्भव बन जाता है, परिणाम स्वरूप वे अपने असली उद्देश्यों से भटक जाते हैं। जहां जहां आर्थिक सहायता आती है वहां वहां आर्थिक दुर्व्यवहार होना शुरू होता है, यह मानवी प्रवृत्ति है, उसे टाला नहीं जा सकता है। क्यों कि संगठन में आने वाले चालक अपनी अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को लेकर आते हैं, फिर उन संगठनों में जाति पंथ धर्म राजनीति घुस जातीं हैं, उनका आपस में नेतृत्व के लिए जातिगत पंथीय धार्मिक एवं राजनीतिक संघर्ष शुरू होता है और अंतमे वे संगठन बिखर जाते हैं। यह वास्तविकता हम देख रहे हैं। कई संगठनों को हमने बनते बिखरते देखा है। ये अधिकांश संगठन हमारे सामने खड़ी समस्याओं के संभाव्य समाधानों के विकल्पों के पिछे दौड़ने लगते हैं, इसमें उनकी उर्जा और पैसा बर्बाद होता है, लोगों को उनके द्वारा शाश्वत स्थायी समाधान नहीं मिलता। क्यों कि वे सदा विकल्पों के पिछे दौड़ने लगते हैं, समस्याओं की जड़ों को उखाड़ने की चेष्टा नहीं करते। इन संगठनों को मिलने वाली सरकारी आर्थिक सहायता सौ प्रतिशत उनतक पहुंचती है यां जनता तक पहुंचती है,इसपर साक्षात ईश्वर भी विश्वास नहीं करेगा। भारत देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने खुलेआम कहा था कि सरकार से निकली सौ प्रतिशत आर्थिक सहायता लाभार्थी जनता के पास पहुंचतीही नहीं सिर्फ पंद्रह प्रतिशत पहुंचती है, शेष 85 प्रतिशत आर्थिक सहायता बीच में बिचौली संस्थाएं खा जाते हैं, भ्रष्टाचार का उद्गम स्थान बनते हैं। अगर कुछ अपवादों को छोड़कर इन संगठनों की यह वास्तविकता है, तब हम उनसे आत्मनिर्भर भारत की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं, नवनिर्माण एवं सृजनात्मक कार्य की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ?

          दुसरी ओर जन आंदोलन किसी भी बाहरी आर्थिक सहायता पर निर्भर नहीं होते, वे किसी भी देशी विदेशी फंडिंग एजेंसी से यां उद्योग से यां सरकार से अपने हाथों में आर्थिक सहायता नहीं लेते, जिन्हें जन आंदोलन को आर्थिक सहायता देनी होती है वे खुद के व्यवस्था से ही आर्थिक नियोजन करते हैं। जिससे जन आंदोलन का किसी भी आर्थिक व्यवहार से संबंध नहीं होता है। ईश्वर ने जिसके जिसके पास जो जो अर्थ ज्ञान विज्ञान विश्वस्त trustee के रूप में दिया है वह स्वयं ही उसका विनियोग जन आंदोलन के सिद्धांतों के अनुरूप जन आंदोलन के उद्देश्यों के प्राप्ति हेतु करके जन आंदोलन को मजबूत एवं सामर्थ्यवान बनाता है। इस स्थिति में जन आंदोलन अपने सिद्धांतों पर और उद्देश्योंपर अटल रहते हैं, उनके प्रति कोई भी समझौता नहीं करते हैं। जिससे जन आंदोलन भटकते नहीं। जन आंदोलन में किसी के व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को कोई भी स्थान नहीं होता, वह सदा जाति पंथ धर्म राजनीति और विचारधारा से दूर रहता है, लेकिन जन आंदोलन में शामिल किसीको भी अपने जाति पंथ धर्म राजनीति और विचारधारा का अपने व्यक्तिगत जीवन में पालन करने को रोकता नहीं, इसकी स्वतंत्रता देता है, लेकिन जन आंदोलन में उनके जाति पंथ धर्म राजनीति और विचारधारा को लाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए जन आंदोलन में जातिगत पंथीय धार्मिक एवं राजनीतिक और विचारधारा संबंधित संघर्ष होने की संभावना ही बचती नहीं। जन आंदोलन किसी भी समस्याओं के समाधान का विकल्प खोजने में अपनी उर्जा और समय बर्बाद नहीं करता, समस्याओं के जड़ों तक पहुंचकर जड़ों को ही सदा के लिए उखाड़कर फेंक देता है। इसलिए वह अपने सिद्धांतों और उद्देश्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनता है। जन आंदोलन किसी से भी आर्थिक सहायता नहीं लेता, इसका सीधा अर्थ है कि जन आंदोलन में किसी भी भ्रष्टाचार यां शोषण की कतई संभावना नहीं बनती। इससे जन आंदोलन में किसी भी बाहरी शक्ति के यां विचारधारा के या सरकार के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप की संभावना ही नहीं बचती है। परिणाम स्वरूप जन आंदोलन इनके आघातों से बच जाता है, खुदको सुरक्षित रखने में सक्षम रहता है। जन आंदोलन का कोई अध्यक्ष उपाध्यक्ष सचिव एवं संचालक नहीं होता, उनका कोई कोष नहीं होता माने कोषाध्यक्ष भी नहीं होता, इससे किसी को भी अपना व्यक्तिगत आर्थिक लाभ लेने की यां किसी भी आर्थिक भ्रष्टाचार की संभावना ही नहीं बचती। क्यों कि जन आंदोलन में शामिल सभी मित्र अपने अपने स्वयं के स्तर पर आर्थिक दायित्व को उठाते हैं। परिणाम स्वरूप, जन आंदोलन में किसी भी सामाजिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार की संभावना ही नहीं बचती।

        आत्मनिर्भर भारत निर्माण करने हेतु जो जन आंदोलन कार्यरत होगा उसमें देशके सृजनशील आदर्श कुशल युवा शक्ति को ही शामिल करना होगा, जो अभी तक किसी भी व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार मुक्त है यां सामाजिक भ्रष्टाचार मुक्त है और जो देश को आत्मनिर्भर बनाने में अपना योगदान देने के लिए कटिबद्ध है । भारत में यह युवा शक्ति विशाल मात्रा में मौजूद हैं लेकिन उन्हें अपने नवनिर्माण सृजनात्मक कार्य करने के लिए कोई निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक संवैधानिक मंच नहीं मिल रहा है, वे किसी भी राजनीतिक, अधार्मिक और असामाजिक संघर्षों में ख़ुद को शामिल करने में कोई भी रूचि नहीं रखते हैं। जन आंदोलन उन्हें वह मंच उपलब्ध करते हैं। क्यों कि जन आंदोलन किसी भी सरकार के यां उद्योगों के यां विचारधारा के यां सामाजिक संगठनों के यां धार्मिक संगठनों के यां किसानों के संगठनों के विरोध में कभी नहीं होते। इन सभी की समस्याएं समान होती है तब सभी समस्याओं का ठोस समाधान भी एक ही होता है, फिर निश्चित समाधान प्राप्ति हेतु आपस में संघर्ष क्यों? जन आंदोलन ठोस स्थायी एवं व्यवहारिक समाधान देता है। इसलिए जन आंदोलन में किसी भी संघर्ष का अस्तित्व नहीं होता है, इसलिए जन आंदोलन ही आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार कर सकता है, कोई संगठन नहीं। 

       कृपया आप अपनी अपनी व्यक्तिगत राय और सुझाव दिजीए, यह वैचारिक मंथन आगे बढ़ने दें,जो जो भी उस मंथन में शामिल होना चाहते हैं उनका सहर्ष स्वागत है। आपस मे परस्पर निरंतर सशक्त संवाद होना चाहिए, जिसकी हम आपसे अपेक्षा करते हैं, मतभेद हो सकते हैं, वह ईश्वरीय व्यवस्था से हमें मिली वास्तविकता है, उसे हम टाल नहीं सकते। लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। आखिर सत्य एक ही होता है, असत्य सत्य को कुछ समय तक ढंक कर रख सकता है, सत्य को उखाड़ नहीं सकता। क्यों कि असत्य को खुद का अस्तित्व नहीं होता। सत्य विरहित निर्गुण निराकार अवस्था माने असत्य होता है। सत्य कभी भी पराभूत नहीं होता।‌ उसे सबको स्वीकार करना ही पड़ेगा। लेकिन इसके पहले सत्य असत्य के बीच में, ज्ञान अज्ञान के बीच में, धर्म अधर्म के बीच में क्या भेद है, वहां तक पहुंचने के लिए हमारे परस्पर रचनात्मक संवाद की आवश्यकता है। कृपया इस पोस्ट को सर्वत्र फारवर्ड किजिएगा ताकि यह संदेश ठीक युवा शक्ति तक पहुंच सकें। धन्यवाद।

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