लेख- पद्मश्री डॉक्टर सुभाष पालेकर

 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर

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ता 21 सितंबर 2023

विषय ... आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भारतीय गो संस्कृति का महत्व


साथियों और बहनों,

प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति भारतीय देशी गो केन्द्रित रही है, क्यों कि भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पुरातन काल में कृषि प्रधान थी,आज भी है और भविष्य में भी रहेगी, यह सुस्पष्ट पारदर्शक वास्तविकता हैं। बिना सजीव एवं उर्वरा भूमि के  कृषि संस्कृति पुरी तरह असंभव है। भुमि को सजीव एवं उर्वरा बनाने में देशी भारतीय गोमाता Bos indicus के ताजा गोबर की सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र भूमिका है, उसका कोई विकल्प नहीं है।‌ क्यों कि भारतीय गोमाता के एक ग्राम गोबर में कम-से-कम 300 करोड़ उपयुक्त सूक्ष्म जीवाणूओं की संख्या होती है, जिन्हें ईश्वर ने भुमि में हयुमस निर्मिती के द्वारा भूमि को सजीव एवं उर्वरा बनाने के लिए भेजा है। ईश्वर ने गोमाता के द्वारा जीवाणूओं के जैवविविधता से संपन्न ऐसा सिर्फ ताजा गोबर भेजा है, लेकिन गोमाता ने अपने द्वारा गोबर खाद नहीं भेजा, रासायनिक खाद नहीं भेजा, कंपोस्ट खाद या वर्मी कंपोस्ट नहीं भेजा,बायोडायनैमिक खाद नहीं भेजा, पंचगव्य नहीं भेजा, अग्नि होत्र नहीं भेजा, गो कृपा अमृतम नही भेजा, वेस्ट डिकंपोजर नहीं भेजा और नास्तिक योगिक कृषि को भी नहीं भेजा , में सारे अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विध्वंसक खाद गोमाता ने अपने शरीर में से नहीं भेजे, जो विशाल मात्रा में हरित गृह वायुओं green house gases का उत्सर्जन करके वैश्विक तापमान वृद्धि global warming और जल वायु परिवर्तन की निर्मिती करके उसके विनाशकारी परिणामों से मानव समेत समस्त सजीव सृष्टि को विनाश की ओर ले जा रहे हैं । माने गोमाता समस्त मानव जाति को ईश्वर ने भेजा संदेश दे रही है कि इन सभी विनाशकारी खादों का उपयोग नहीं करना है। लेकिन गोमाता को कोई गोभक्त नहीं सुन रहा है। इस स्थिति में सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन पुरे श्रद्धा और विश्वास के साथ दावा कर रहा है कि हम इन सभी विध्वंसक खादों का उपयोग नहीं करते, सिर्फ भारतीय गोवंश का ताजा गोबर से बनाया जीवामृत घनजीवामृत भुमि में उसका उपयोग करता है, गोमाता के  ताजा गोबर के रूप में ईश्वर ने भेजें आदेश का शतप्रतिशत पालन करते है। 

     देशी गोवंश को बचायेगा सिर्फ सुभाष पालेकर कृषि करने वाले किसान और सेवाभावी पिंजरापोल, गोवंश को‌ उद्योग केंद्रित गोशालाएं नहीं बचायेगी। आर्थिक मदत के अभाव से सेवाभावी गोशाला पिंजरापोल चलाना लगभग असम्भव बन रहा है। सेवाभावी गोशालाओं की असह्य पीडा जानकर उन्हें आर्थिक मदद देने वालों की संख्या तेजी से घट रही है। दिनों दिन बढ़ती मात्रा में गोवंश कटने के लिए कसाई खाने जा रहा है। जब साप्ताहिक हाट में बेचने के लिए गोवंश आता है तब दलालों के द्वारा उन्हें खरीदकर वह गोवंश कसाईखाने पहुंचता है। गो पालक किसानों को देशी गोवंश का कृषि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व मालूम न होने से आर्थिक संकटों से ग्रस्त गोपालक किसान अपना गोवंश अज्ञानवश और मजबूर बनकर हाट में दलालों को बेचता है,तब गोवंश कटने के लिए कसाईखाने पहुंचता है।‌ किसान सुभाष पालेकर कृषि का शिबीर सुनने के पहले यां इस विषय की किताबें पढ़ने के पहले या सोशल मीडिया पर सुभाष पालेकर कृषि के व्हिडिओ देखने के पहले अपना गोवंश हाट में दलालों को अज्ञानवश बेंचता है, लेकिन जैसे ही वे सुभाष पालेकर कृषि के शिबीर सुनते हैं, किताबें पढ़ते हैं और सोशल मीडिया पर व्हिडिओ दखते और शिवार फेरी देखते हैं,तब वे किसी भी हालत में देशी गोमाता को ढुंढते है और उसे खरीदकर ही शांत हो जाते हैं।‌ इसलिए, अगर गौ‌रक्षा करनी है तो इसके लिए सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन ही एकमात्र सही अहिंसक संवैधानिक वैज्ञानिक आध्यात्मिक उपाय है। एक सत्य को आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा कि भारतीय देशी गोवंश बचेगा तब कहीं भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता बचेगी।‌चाहे आप इस सत्य को माने या न माने।

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