अब चांदा मामा बहुत दूर के नहीं,बस एक टूर के होंगे !
चांदा मामा बहुत दूर के नहीं,बस एक टूर के होंगे!
भारत को ऋषि, मुनियों का देश कहा जाता रहा है। लेकिन ऋषि, मुनियों की
पहचान के साथ साथ उनके बारे में आम लोगों की समझ भी समय के साथ साथ बदलते रही है।
ऐसा नहीं है कि भारत में अब कोई भी ऋषि, मुनि नहीं बचे हैं। आज भी कई ऐसे ऋषि,
मुनि हैं जो हमारे बहुप्रचलित समाज और सामाजिक मान्यता से दूर किसी किसी गुफे या
किन्हीं कंदराओं में अपनी तपस्या में लगे हुए हैं।
बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो हमारे बीच हमारे समाज में रहते हुए हीं हमारे
बहुप्रचलित सामाजिक मान्यताओं के आधार पर अपने आप को ऋषि,मुनि बताते हैं। ऐसा नहीं
है कि ये सब स्थिति पहले के जमाने में नहीं थी। प्राचीन काल से हीं ऋषि, मुनियों
के भी कई प्रकार को हम देखते और समझते रहे हैं।
आज अगर हम इसरो या अन्य वैज्ञानिकों के जीवन और दिनचर्याओं को समझने की
कोशिश करें तो यह बात भी कहीं न कहीं उसी परम्परा को आगे बढ़ाने वाली एक कड़ी के
रुप में प्रतीत होगी। बस इस बात को समझने के लिए एक सटीक समझ और पूर्वाग्रह तथा
भेदभाव रहित एक सही नजरिये को भी विकसित करने एवं जन्म देने की भी आवश्यकता है।
राज ऋषि, ब्रह्म ऋषि, सप्तऋषि वैसे हीं मुनियों के बारे में भी कई अलग अलग
नाम हम सुनते रहे हैं। समयानुसार अलग अलग काल में अलग अलग तरह से अलग अलग संस्कृति
के रुप में इन्हें परिभाषित भी किया जाता रहा है। जैसे वैदिक काल के अनुसार
ब्रह्मर्षि, राजर्षि, महर्षि, देवर्षि,परमर्षि, श्रुतर्षि और काण्डर्षि, ये मुख्य
रुप से सात प्रकार के ऋषि होते थे।
वैसे हीं जो बहुत कम बोलते या बिल्कुल हीं मौन रहकर कार्य करते, उन्हें
मुनि कहा गया। अब सवाल यह उठता है कि हम चांदा मामा बहुत दूर के नहीं,बस एक टूर के
होंगे विषय पर जब कुछ लिख रहे हैं तो फिर ये ऋषि, मुनियों और सभ्यता-संस्कृति के
बारे में भी कुछ क्यों लिख रहे हैं।
इसके जवाब में मै लिखना चाहूंगा अब वह सही समय फिर से आ चुकी है जब हम उस
स्थिति में पहुंचने लगे हैं जिनकी जड़ में हमारे भारतीय सभ्यता-संस्कृति की
वास्तविक और गौरवशाली पहचान भी बहुत पहले से समायी हुई है। कालांतर में भारत को
सोने की चिड़िया कहा गया तो वह भी ऐसे हीं नहीं कहा गया।
भारत को सोने की चिड़िया बनाने की जड़ में था हमारे ऋषि, मुनियों और उन
पूर्वजों के युगों युगों का साथ जिनका भरोसा और आदर भी सदा हमारे उन ऋषि, मुनियों
पर बना रहा जो परमार्थ में जुटे रहे। हमारे प्राचीन वैदिक ज्ञान-विज्ञान और
संस्कृति के बल पर हीं हमारे देश अखण्ड भारत को कालांतर में सोने की चिड़िया भी समझा
गया।
वास्तविकता तो यहीं है कि जो भी हमारे ऋषि, मुनि थे और आज भी हैं उन्हें
पहचानने के प्रति हम-सबका नजरिया भी समय के साथ साथ तो बदल सकता है। लेकिन उन सभी के
प्रति हमें अपनी श्रद्धा और भक्ति को आज भी बरकरार रखने की जरुरत है, जिनके
मन-मस्तिष्क में परमार्थ की भावना समायी हुई है।
हमें उन ऋषि, मुनियों की पहचान करने की आवश्यकता है जो वसुधैव कुटुम्बकम
के सिद्धांतों पर चलते हुए परमार्थ भाव लिये हुए हैं। यह बात मै यहां इसलिए भी लिख
रहा हूं क्योंकि जैसे हीं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
द्वारा भारत के चंद्रयान-3 को चंद्रमा के
दक्षिणी ध्रुव पर सफलता पूर्वक उतारा गया तो भारत चंद्रमा के इस सबसे दुर्गम ध्रुव
पर पहुंचने वाला विश्व का पहला देश भी बन गया।
हम यह बात समझ सकते हैं कि जो देश वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांतों पर चलता
रहा वहीं देश कालांतर में दुनिया भर के कई आक्रांताओं और उपनिवेशों का शिकार भी
बना। मगर अपनी आजादी के महज 7 दशक बाद ही यह फिर से अब अपने ज्ञान-विज्ञान का लोहा
मनवाने में दुनिया के विकसित से विकसित देशों को भी पीछे छोड़ने लगा है।
समझने वाली बात है कि जिस वेद शास्त्र और धर्म ग्रंथों के उपर से भारतीयों
का विश्वास कम करके और केवल पश्चिम के सभ्यता संस्कृति को अति आधुनिक और विशेष
बताया गया, उन्हीं वेद शास्त्रों और धर्म ग्रंथों के उपर एक बार फिर से भारतीयों
का विश्वास बढ़ने लगा है।
भारत के इसरो चीफ एस. सोमनाथ जिनका पूरा नाम श्रीधर पार्रिकर सोमनाथ है ने
भी इसी साल मई के महीने में उज्जैन में महर्षि पाणिनि संस्कृत और वैदिक
यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करने के क्रम में ये दावे भी किये थे
कि विज्ञान के सिद्धांत वेदों से आए हैं। अलजेब्रा से लेकर यूनिवर्स तक में यूरोप
के वैज्ञानिकों ने नकल की है।
उस कार्यक्रम में इसरो चीफ एस. सोमनाथ ने भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा
को वैज्ञानिक बताते हुए यह भी कहा था, कि संस्कृत में वैज्ञानिकों के योगदान की
छाप हजारों सालों की भारतीय संस्कृति की यात्रा में देखी जा सकती है। उन्होंने कहा
कि इंजिनियरों और वैज्ञानिकों को संस्कृत बेहद पसंद है। क्योंकि यह कम्प्यूटर की
भाषा को सूट करती है।
केरल के निवासी इसरो चीफ एस. सोमनाथ के बारे में बताया जाता है कि वे
संस्कृत का अच्छा ज्ञान रखते हैं। इससे पहले वे यानम नाम की एक संस्कृत फिल्म में
अपना अभिनय भी कर चुके हैं। अतः आज के आधुनिक जमाने में भी ज्ञान-विज्ञान से जुड़ी
भारत की संस्कृति और प्राचीनतम भाषाओं के महत्व को एक बार फिर से समझने की
आवश्यकता है।
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