हमें दुनिया के लिए विकल्प तैयार करना होगा
पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर
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ता 12 सितंबर 2023
विषय ... पाश्चात्य अर्थव्यवस्था की नौका डुब रही है, हमें विकल्प देना होगा।
साथियों और बहनों,
अप्राकृतिक अवैज्ञानिक पाश्चात्य विकास progress का शोषणकारी विध्वंसक माॅडेल जब किसी देशके अर्थ व्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद gross domestic production GDP को ऊंचाई पर ले जाता है और गिने चुने लोगों को दुनिया के सबसे अमीरों के सूची में शामिल करता है, तब, उसी समय वही विकास का माॅडेल आम आदमी की प्रति व्यक्ति आय को निम्न स्तर पर लाता हैं। इसका अर्थ है कि यह पाश्चात्य विकास अमीरों को और अमीर बनाता है और गरीबों को और गरीब बनाता है। यह उस माॅडेल का दोष नहीं है, यह दोष उस व्यवस्था system का है, जिसके हाथ में इस पाश्चात्य विकास की डोर है। भारत आज दुनिया की अमेरिका चायना जापान और जर्मनी के बाद पांचवीं श्रेष्ठ अर्थव्यवस्था हैं, यह निश्चित रूप से देश के लिए असीम गौरव की बात है। लेकिन आज भारत निवासी आम आदमी के प्रति व्यक्ति वार्षिक आय में दुनिया के सभी देशों में भारत देश 142 वे नंबर पर खडा है। यह बात चिंतनीय है। इसका अर्थ यह है कि भारत के कूल 142 करोड़ जनता को गरीबी के चक्रव्यूह में से बाहर निकालना है तब हमें इस अप्राकृतिक अवैज्ञानिक पाश्चात्य विकास के शोषणकारी भ्रष्ट माॅडेल को त्यागकर उसका एक ऐसा समान्तर अस्सल भारतीय शोषणमुक्त एवं भ्रष्टाचार मुक्त रचनात्मक सृजनात्मक अर्थव्यवस्था का सर्वोत्तम माॅडेल विकसित करना ही पड़ेगा, जिसे पुरी दुनिया स्वीकार करने के लिए बाध्य हो। क्या यह संभव है? हां ज़रूर संभव है। भारत के पास असीमित बौद्धिक संपदा है, जिसका लाभ विकसित अर्थव्यवस्थाएं ले रही हैं। इसके लिए हम सब भारतीयों को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से,जाती से, पंथ से, धर्म से, राजनीति से और विचारधारा से ऊपर उठकर भारत देश के हित में एक साथ एक जुट होकर परस्पर अखंड संवाद करके , अविराम चिंतन मंथन कृती के महायज्ञ की शुरुआत करनी होगी।भारत गुलामी मुक्त एवं शोषणमुक्त देश रहेगा ,तो हमारी अगली पीढ़ी अस्तित्व में रहेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था उद्योग प्रधान नहीं है,वह आज भी कृषि प्रधान है। अर्थात इस हमारे नई संभाव्य भविष्य कालीन अस्सल भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता होगी। क्यों कि मानवी सभ्यता आज अतिरिक्त भोगवाद के चरम सीमा तक पहुंच कर वापस नीचे आ रही है, उसे नीचे आनाही है, परिणाम स्वरूप वैश्विक महामंदी लगातार गंभीर बनती जा रही है, उसे बनना ही है। अर्थात अब पाश्चात्य अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है। आगे वह अधिकाधिक अस्वीकार्य बनती जायेगी, इस स्थिति में हम भारतीय लोगों का दायित्व बनता है कि हमारी नई अस्सल भारतीय अर्थव्यवस्था हो और पुरी दुनिया उसे स्वीकार करें । आज एडम स्मिथ के आर्थिक विचार डगमगाने लगे हैं। उसका लाभ लेना ही पड़ेगा। आपको क्या लगता है? क्या हम हमारी अस्सल भारतीय नई संभाव्य भविष्यकालीन अर्थव्यवस्था को गठित करने में सक्षम एवं सफल होंगे? आपके सटिक प्रतिक्रिया एवं रचनात्मक सृजनात्मक सुझाव की अपेक्षा करता हूं।
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