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 पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर

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ता 23 अगस्त 2023 चंद्रयान अवतरण दिन

विषय ... प्राकृतिक कृषि एक महाझूठ असत्य छल-कपट है। कैसे ? एक वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण 


साथियों और बहनों,

प्राकृतिक कृषि, वैदिक कृषि और यौगिक कृषि तीनों वास्तव में महाझूठ असत्य छल-कपट है, क्यों कि प्राकृतिक कृषि, वैदिक कृषि और यौगिक कृषि नाम का कोई भी कृषि तकनीक (तंत्र) दुनिया में और ईश्वर निर्मित प्रकृति में कहीं भी अस्तित्व में नहीं है। ईश्वर निर्मित खेती माने ईश्वर निर्मित प्रकृति। पृथ्वी पर प्रकृति पहले आई, बादमें मानव आया। माने प्रकृति मानव द्वारा निर्मित नहीं है, ईश्वर द्वारा निर्मित है, प्रकृति ईश्वरीय सृजन है, संविधान हैं। प्रकृति माने घने जंगल।जो जो तकनीक प्रकृति में अस्तित्व में है वही प्राकृतिक है, जो प्रकृति में अस्तित्व में नहीं है वह प्राकृतिक कृषि कैसे हो सकती है? परंपरागत खेती, रासायनिक खेती, जैविक खेती और सुभाष पालेकर कृषि,इन चारों कृषि तकनीकों में भूमिकी ज्योताई cultivation है, बीज बोआई है, छांट कलम रोपाई है, पौधों की रोपाई  transplantation है, निराई weeding और गुड़ाई hoeing है, सिंचाई है, दवाओं का छिड़काव है, उप्पर से गोबर खाद, रासायनिक खाद, कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट खाद, घनजीवामृत जीवामृत का उपयोग है, फसल कटाई है, फ़सल सूरक्षा के लिए बाड fencing है । लेकिन घने जंगल रुपी प्रकृति में ये सारे कृषि तकनीक कहीं भी अस्तित्व में नहीं है। अगर है तो आपको खूला आवाहन चैलेंज है, प्रकृति में कहां है ये सारे तकनीक? दिखाओ । अगर प्रकृति में ये चारों तकनीक अस्तित्व में ही नहीं है, तब आप सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक कृषि कैसे कह सकते हैं? इसका अर्थ यह है कि प्राकृतिक कृषि दुनिया में और प्रकृति में अस्तित्व में नहीं है, सुभाष पालेकर कृषि वास्तव में प्राकृतिक कृषि नहीं है,इस सत्य को तो आप सभी महानुभावों को स्वीकार करना ही पड़ेगा, इसमें कोई दोराय नहीं है। इसका अर्थ यह है कि सुभाष पालेकर कृषि वास्तव में प्राकृतिक कृषि नहीं है, वह घनजीवामृत जीवामृत आच्छादन वाफसा और जैवविविधता होने वाली सिर्फ सुभाष पालेकर कृषि है, उसे जबरन प्राकृतिक कृषि कहना एक बहुत बड़ा झूठ हैं, धोखाधड़ी है, छल-कपट है,पाप हैं, नास्तिकता है।सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक कृषि कहना देश को और किसानों को गुमराह करना है, देश के साथ धोखाधड़ी है, पाप हैं, नास्तिकता है। सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक कृषि कहके अथवा गो आधारित खेती कहके क्यों देश को गुमराह किया जा रहा है? क्यों देश के विद्यार्थियों को गुमराह किया जा रहा है? इसका जवाब इन लोगों को वैज्ञानिक एवं संवैधानिक कसौटियों पर देना ही पड़ेगा, चाहे वह कोई भी हो। भारतीय संविधान में कौनसी धारा है, दिखाइए, जिसमें लोगों को झूठ कहकर गुमराह करना संवैधानिक है ? अगर नहीं है,तब क्यों यह असंवैधानिक पाप हो रहा है? 

      अगर वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को वाल्मीकि रामायण कहा जाता है, संत कबीर के दोहे कबीर अमृतवाणी कहीं जाती है,संत ज्ञानेश्वर रचित ग्रंथ को ज्ञानेश्वरी कहा जाता है, संत तुकाराम द्वारा रचित गाथा को तुकाराम गाथा कहा जाता है, महान् वैज्ञानिक आइंस्टाइन द्वारा हुई सापेक्ष वाद की खोज को आइंसटाइन सिद्धांत के रूप में कहा जाता है, महान् वैज्ञानिक न्यूटन द्वारा हुई गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज को न्यूटन खोज मानी जाती है, तब फिर भारत देश के नागरिक सुभाष पालेकर द्वारा कियी गई सौ प्रतिशत स्वदेशी तकनीकी खोज को सुभाष पालेकर कृषि कहने में इनको क्यों पीडा दुःख क्लेश हो रहें हैं? सौ प्रतिशत विदेशी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक एवं वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाली, प्राकृतिक संसाधनों का नाश करने वाली, किसानों को लुटने वाले जैविक कृषि का माने organic farming का कृषि विश्वविद्यालय organic farming agriculture University स्थापित करते समय इनके स्वदेशी प्रेम को कोई समस्या नहीं आई, लेकिन सौ प्रतिशत स्वदेशी होने वाले, वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को रोकने वाले, प्राकृतिक संसाधनों की सूरक्षा करने वाले और किसानों को लूट से बचाने वाले सुभाष पालेकर कृषि को ये लोग इतना कडा विरोध क्यों कर रहे हैं? क्या रहस्य है? 

         घने जंगल रुपी प्रकृति में इन सभी चारों कृषि तकनीकों में 

 दुनिया में सिर्फ चार कृषि तकनीक अस्तित्व में है.. पुरातन काल से चली आ रही एवम अफ्रीका में विकसित गोबर खाद आधारित परंपरागत गो आधारित खेती indigenous farming, विदेशी रासायनिक खेती chemical farming, युरोपीयन जैविक खेती organic farming और सौ प्रतिशत स्वदेशी सुभाष पालेकर कृषि SPK । इन चार कृषि पद्धतियों में से गोबर खाद पर आधारित परंपरागत गो आधारित खेती को आप सिर्फ गोशालाओं में देख सकते हैं, क्यों कि उनके पास प्रचूर मात्रा में गोबर खाद उपलब्ध है। लेकिन आम किसानों के खेत में कोई भी किसान सौ प्रतिशत परंपरागत खेती नहीं करता, कर भी नहीं सकता, करना असंभव है। परंपरागत गो आधारित खेती पर मैंने जो तुलनात्मक अध्ययन किया , उसके निष्कर्ष पर मुझे मालूम पडा की  अगर हमे गोबर खाद पर गो आधारित परंपरागत खेती में अगर  रासायनिक खेती में प्रति एकड़ मिलने वाले कृषि उत्पादन इतना कृषि उत्पादन लेना है,तब हमें हर साल प्रति एकड बीस बैल गाड़ी माने 20000 रुपये का दस टन गोबर खाद डालना ही पड़ेगा और इसके लिए प्रति एकड़ दस देशी गाय को पालना पडेगा। क्या यह आम किसानों को संभव हैं ? बिल्कुल नहीं, सपने में भी संभव नहीं है, अगर संभव है तो गौशालाओं को संभव‌ है, क्यों कि इतना गोबर खाद का क्या करें यह उनकी समस्या है, महंगा चारा खरीदने के लिए उन्हें अपना गोबर खाद बेंचना ही पडता है, यह उनकी मजबूरी है, दोष नहीं है।

       गोबर खाद, कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट खाद, खल्लियां पंचगव्य और अन्य कोई भी जैविक खाद खेती में आप डालते हैं,  तब उनमें होने वाले कार्बन समृद्ध संयुगो का carbonic compounds का एक्टिनोमायसिटिज नाम के विघटन कारी सूक्ष्म जीवाणूओं के द्वारा तुरंत विघटन होकर उनमें से सारा जैविक कार्बन मुक्त होकर हवामे उत्सर्जित होता है, हवा में उस कार्बन का प्राणवायु के साथ रासायनिक संयोग होता है, इस प्राणीदीभवन oxidation क्रिया से तुरंत करबाम्ल वायु माने उसका कार्बन डाइऑक्साइड में रुपांतरण होता है,वह वातावरण में 120 साल तक रहता है, यह हरित गृह वायु green house gas है जो वैश्विक तापमान वृद्धि global warming और जल वायु परिवर्तन climate change की निर्मिती करता है, जिसका विघातक परिणाम हम किसान और पुरी दुनिया भुगत रही है। क्या कर रहे हैं ये लोग? सुभाष पालेकर कृषि में हम ये विनाशकारी गोबर खाद, रासायनिक खाद, कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट, पंचगव्य बिल्कुल डालते नहीं, माने हम  वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा नहीं देते, उल्टा उसे रोकते हैं, तब भी सुभाष पालेकर कृषि को विरोध? क्यों? किस वैज्ञानिक और संवैधानिक कसौटियों पर ये लोग मेरा और सुभाष पालेकर कृषि का विरोध कर रहे हैं? 

     जब आप गो आधारित खेती में गोबर खाद डालते हैं, रासायनिक खेती में रासायनिक खाद डालते हैं, जैविक माने सजीव खेती में कंपोस्ट खाद वर्मी कंपोस्ट खाद खल्लियां पंचगव्य डालते हैं, तब इन  सभी खादों में होनेवाले नाइट्रोजन समृद्ध संयुगो proteinous compounds का ये जीवाणु विघटन decomposition करते हैं, जिसमें से अमोनिया वायु मुक्त होकर भुमी मे उत्सर्जित होता है। भुमि में होनेवाले नायटरोसोमानास जीवाणू,नायटरो काॅकस जीवाणू इस अमोनिया का रुपांतरण नाइटराईडस nitrides में करते हैं और अगले पादान पर नायटरो बैक्टीरिया और पेनिसिलियम फफूंद fungus इन नाइटराईडस का रुपांतरण नायटरेटस nitrates में करते हैं, आखिर में तीसरे पायदान पर मायकरो काॅकस डी नायटरीफाईंग micro coccus denitrifying bacteria जीवाणू इन  नायटरेटस का मुक्त नत्र वायू free nitrogen में रुपांतरण करते हैं, यह मुक्त नायटरोजन हवामे उत्सर्जित होकर हवा में उसका प्राणवायु के साथ प्राणीदीभवन oxidation होकर उसका नायटरस ऑक्साइड गैस nitrous oxide Gas में रुपांतरण होता है, जो हवा में निवास करता है, यह खतरनाक हरित गृह वायु green house gas है जो वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहा है, जो कृषि का और मानव का अस्तित्व को मिटाने में लगा हुआ है। क्या कर रहे हैं ये गो आधारित खेती वाले, रासायनिक खेती वाले और जैविक खेती organic farming करने वाले और जैविक खेती का गुजरात में कृषि विश्वविद्यालय organic agriculture University स्थापित करने वाले हमारे मित्र? सुभाष पालेकर कृषि में इन में से कोई भी जैविक खाद एवं रासायनिक खाद कंपोस्ट खाद वर्मी कंपोस्ट खाद खल्लियां पंचगव्य डाले नहीं जाते,हम वैश्विक तापमान वृद्धि global warming और जल वायु परिवर्तन climate change को रोक रहें, उसके द्वारा होने वाले विनाश को रोक रहें हैं, तब भी सुभाष पालेकर कृषि का घोर विरोध? क्यों? 

    गोबर खाद का गड्ढा, कंपोस्ट खाद का गड्ढा, वर्मी कंपोस्ट खाद का गड्ढा , धान की खेती में भरे पानी मे, गन्ने को दिया अनावश्यक पानी में, इन सभी में प्राणवायु के बिना जीने वाले अवायू जीवी anaerobic bacteria जीवाणू इन खादों की सड़न क्रिया spoiling करते हैं और उसमें से विशाल मात्रा में मीथेन गैस हवा में उत्सर्जित होता है, यह विनाशकारी हरित गृह वायु हैं, वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है, हमारे अस्तित्व को बहुत बड़ा खतरा खड़ा कर रहा है। क्या कर रहे हैं ये गो आधारित खेती करने वाले, रासायनिक खेती करने वाले, जैविक खेती करने वाले हमारे मित्र? सुभाष पालेकर कृषि में हम इनमें से कोई भी जैविक खाद का और रासायनिक खाद का उपयोग करते नहीं है, हम आपके अस्तित्व को बचाने में लगे हुए हैं, फीर भी हमारा विरोध? क्यों? 

      साथियों,यह वैश्विक तापमान वृद्धि और जल वायु परिवर्तन, बदलता मानसून, ज़हरीला भोजन, प्रदुषित हवा और पानी, इनको बढ़ावा देने वाली गो आधारित खेती, रासायनिक खेती, जैविक खेती, नक़ली बुद्धिमत्ता artificial intelligence, यंत्र मानव robot, किसानों की आत्महत्याएं, हमें लुटने वाली बाजार व्यवस्था,भयावह बेरोजगारी, भूखमरी, मानवी शरीर में पैदा होने वाली विकृतियां, कर्क रोग cancer, कोरोना, मधुमेह diabetes, दिल का रुक जाना heart attack, उच्च रक्तचाप high blood pressure और तेजी से बढ़ रही वैश्विक महामंदी ....ये हम किसानों के और शहरी उपभोक्ताओं के मुख्य शत्रु है, इन से हमें लडना है, एकसाथ मिलकर लड़ना है। तो फिर आपस में टकराव क्यों? परस्पर विचारों का एवम अनुभवों का परस्पर आदान-प्रदान क्यों नहीं? आइए,हम आपका स्वागत करते हैं, जाती पंथ धर्म राजनीति और विचारधारा से उप्पर उठकर एक-साथ संवैधानिक वैज्ञानिक आध्यात्मिक अहिंसक जन आंदोलन खड़ा करें। हम तैयार हैं। आप ?

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