नकारात्मक और सकारात्मक सोच

 नकारात्मक और सकारात्मक सोच 



हमारे सोच का हिस्सा नकारात्मक और सकारात्मक दोनों हो सकता है लेकिन हमारे मन-मस्तिष्क में कोई भी भ्रम तब पैदा होती है जब मन-मस्तिष्क किसी स्थिति का सही समाधान निकालने की कोशिश कर रहा होता है,  और वह ऐसा करने में सक्षम नहीं हो पाता है। 


ऐसा क्यों होता है कि एक स्थिति में भ्रम पैदा होता है जबकि एक स्थिति में किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं होता है और हमारा मन कोई निर्णय लेने की स्थिति में होता है। 


भ्रम पैदा होता है -क्योंकि यह हर संभव में कोई न कोई या बहुत सा नकारात्मक पक्ष देखता है। ऐसे में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों हीं प्रकार का पक्ष किसी के जीवन का एक एक हिस्सा तो बन सकता है, लेकिन नकारात्मक और सकारात्मक दोनों हीं प्रकार के पक्षों का संबंध सीधे तौर पर किसी सोच और समझ पर हीं निर्भर करती है। 


अगर हमारी सोच सकारात्मक होगी तब हमारे लिए कोई भी स्थिति नकारात्मक नहीं होगी. कोई भी स्थिति हमारे लिए नकारात्मक तब बनती है, जब हमारा सोच नकारात्मक होगा।


 उदाहरण के लिए कहा जा सकता है कि एक हीं स्थिति किसी के लिए नकारात्मक है, तो किसी के लिए सकारात्मक. क्योंकि सबसे पहले सोच हीं नकारात्मक या सकारात्मक बनता है। 


इसलिए सबसे पहले सोच का सकारात्मक होना आवश्यक है.


 और सोच या समझ सकारात्मक होगा तो कर्म भी उसी दिशा में होंगे. तथा उसी अनुकूल स्वतः परिणाम भी किसी के सामने होता है। 


अतः हम-सबके लिए यह समझना ज्यादा आवश्यक है कि भ्रम तब पैदा होता है जब हमारा मन किसी स्थिति का सही समाधान निकालने की कोशिश कर रहा होता है, और वह ऐसा करने में असमर्थ होता है.


 क्योंकि तब मन हर संभव में भी कुछ नकारात्मक देखता है. नकारात्मक विचार से कुछ भी संभव नहीं,  और सकारात्मक विचार के लिए कुछ भी असंभव नहीं होते। 


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