पीएम मोदी का विरोध क्यों!
मोदी का विरोध क्यों।
जैसा कि हम-सभी को मालूम है कि भारत एक ऐसा लोकतंत्र है जहां के लोगों द्वारा दुनिया के किसी भी दूसरे देश की अपेक्षा अपनी भावनाएं वयक्त करने की ज्यादा छूट देखी जाती है।
लेकिन विशेषकर यह छूट अगर भारतीय भी बाहर के किसी देश में हों तो वहां उनकी यहीं भावनाएं प्रकट करने के रूप में नहीं दिखती है।
जी हां हम बात कर रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उन भावनाओं की जिनके आधार पर आज दुनिया भर के देशों के नेताओं के बीच आज स्वयं मोदी की भी एक बड़ी पहचान बन चुकी है।
मोदी और मोदी सरकार के दौर में आज भारत और उनके चुने हुए नेता नरेंद्र मोदी दोनों की ख्याती लगातार बढ़ रही है, तो क्या इसका फायदा देश के आम जनों को भी हो रहा है? यह एक अहम सवाल है।
लेकिन ऐसे वक्त में जब दुनिया भर के नेताओं के बीच नरेंद्र मोदी की ख्याती स्थापित हो रही है. वहीं सबसे ज्यादा आज भारत में हीं मोदी का विरोध भी क्यों है? और पीएम मोदी का ये विरोध भी कौन कर रहे हैं?
अगर हम इस बात के कारण में जाने की कोशिश करें तो यह पत्ता चलता है कि भारतीय लोकतंत्र की यहीं तो सबसे बड़ी खूबसूरती भी समझी जाती है कि यहां सबको अपना विरोध जताने की खूली छूट है।
मगर यहां कई बार विरोध का स्वर इतना उंचा होता है कि सत्य लगभग नहीं दिखता है। कह सकते हैं कि यहां किसी को भी एक लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने की इतनी ज्यादा छूट मिल चुकी है कि कई बार विरोध करने के इस छूट के पीछे सत्य भी पूरी तरह से धूमिल दिखता है।
ऐसे में यहां कौन दोषी है, कौन निर्दोष, -यह जनता नहीं अंततः न्यायालय के फैसले द्वारा हीं बहुत बार तय होता है। क्योंकि देश की आम जनता आज भी पार्टी, जाति, धर्म, भाषा, लिंग, रंग और भी न जाने कितने वर्गों में अलग अलग बंटी हुई या बांटी हुई दिखती है।
ऐसे में इस देश की जनता कई बार किसी गलत नेता या पार्टी के साजिश का शिकार भी बनते रहती है. जिसका प्रभाव अंततः देश के सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण विषय यानि आर्थिक विकास पर हीं पड़ता है।
यह बात मै इसलिए कह रहा हूं कि कई बार जनता जिसे किसी घोटाले के आरोप या किसी भी और तरह के आरोप के सत्य होने के बावजूद भी सेलेक्ट करती है, तो दूसरी ओर न्यायालय को उसके उपर लगे आरोप को सही ठहराते हुए उसे हीं सज़ा भी सुनाते देखा जाता है।
साफ है देश की आम जनता आज भी पार्टी, जाति, धर्म, भाषा, लिंग, रंग और न जाने कितने रूपों में अलग अलग बंटते हुए कई बार सही निर्णय नहीं ले पाती है।
जिसका सीधा सीधा लाभ सबसे ज्यादा भारत के उन सभी नेताओं को हीं मिलता है जो इस गलत धारणा के आधार पर आज भी अपनी राजनीति की रोटियां सेंकते देखे जाते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं होता है कि एक लोकतंत्र में जनता को कोई भी ऐसा फैसला नहीं करना चाहिए जो अंततः न्यायालय के फैसले से अलग और उससे भी बढ़कर दिखे।
यहां इस बात को दोहराना जायज है कि एक लोकतंत्र की यहीं तो सबसे बड़ी जिसे हम खूबसूरती कहें न कहें, मगर पहचान भी होती है. यह बात भी हमें समझनी होगी।
भारत जैसे लोकतंत्र के सभी महत्वपूर्ण और खासकर सबसे ज्यादा विकास के मामले में न्यायालय से ज्यादा बड़ी भूमिका यहां के आम जनता की होती है।
ऐसे में आवश्यकता यह समझने की है कि हमें कोई भी नेता या पार्टी व्यक्तिगत या सामूहिक रूप में आखिर में बांटने के लिए भी अंततः कौन सी मंशा लिये हुए है।
क्या इस तरह से देश-हित या मानव-हित भी क्या कभी संभव हो सकता है. जहां हम आर्थिक विकास के सभी महत्वपूर्ण पायमाने को भी किसी पार्टी, जाति, धर्म, भाषा, लिंग, रंग और भी न जाने कितने वर्गों में बंटे होने के कारण नजरअंदाज करें।
कहीं हम किसी के बहकावे में आकर किसी न किसी तरह साजिश के शिकार तो नहीं हो रहे हैं, वगैरह वगैरह तमाम ऐसी बातें तब हमारे जेहन में उठती हैं।
मै यहां यह बिल्कूल स्पष्ट करना चाहूंगा कि एक लोकतंत्र में वोट हासिल करने की इच्छा लिए व जीतने के लिए कोई नेता या पार्टी किसी भी आधार पर हमें बांटने की कोशिश भी करते हैं.
तो वह समझ अंततः हमारी दो तरह की समझ में से किसी एक पर हीं विशेष रूप से आधारित होगी।
पहली समझ हमारे देश के विकास की उन आर्थिक पैमानों के आधार पर हीं होगी जिनसे दुनिया के किसी भी एक देश के विकास की पहचान की जा सकती है।
दूसरी वो समझ होगी जो सभी किसी भी तरह से केवल अपनी सत्ता चाहने वाले लोगों या समूहों ने हमें एक देश में रहते हुए भी आपस में बांट देने के लिए दशकों पहले से विकसित की है।
इसलिए किसी भी तरह से मोदी का विरोध करने वालों को यहीं एक बात सबसे ज्यादा समझने की कोशिश करनी होगी कि क्या मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई दर के अलावां और सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास की कसौटियों को ठीक करने के लिए उनसे अच्छे काम किये हैं या नहीं, जो स्वयं आज मोदी का विरोध कर रहे हैं।
अगर हां, तो इसके बावजूद भी इन विरोधों का कारण सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत हीं प्रतित होता है जिनके बहकावे में हम जनता भी किसी भी तरह से अंततः कई बार फंसते रहे हैं, और अगर नहीं तो हीं यह विरोध सामूहिक भी यानि पूरे देश के आवाज के रूप में मानी जा सकती है।
ऐसे में देश की आम जनता को किसी भी व्यक्तिगत विरोध को एक सामूहिक विरोध समझने से बचना चाहिए, साथ हीं किसी भी रूप में केवल व्यक्तिगत विरोध करने वालों के बहकावे में आने से भी बचना चाहिए।
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