भारतीय सभ्यता संस्कृति और हमारी जीवन-शैली

मित्रों और बहनों,

आज से आठ हजार साल पहले हमारी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पुरे दुनिया में फैली थी, इस के प्रमाण पुरातत्त्वीय उत्खनन से मिलने वाली भगवान गणेश जी की मुर्तियां और पुरातन नगर रचना के अवशेषों से मिलते हैं,आज भी मिल रहे हैं। 

लेकिन,आज हमारे भारत देश में भी हमारी अस्सल भारतीय संस्कृति और सभ्यता कहीं भी दिखाई नहीं देती है, अब वह अधिकांश विदेशी बन गई है। 

         आप सब अपने दैनंदिन निजी जीवन में झांककर देखिए कि आप प्रातःकाल नींद से उठने के बाद रात को सोने तक कौन कौन-से वस्तुओं का, तकनीकों का, विचारधाराओं का, दवाओं का, कृषि तकनीकों का, जीवन‌ शैली का ,गाय का , खाद्य पदार्थों का, चुनाव पद्धतियों का, संपर्क साधनों का, कपड़ों का, शैक्षणिक अभ्यास क्रम का,खेल कुद का, न्याय व्यवस्था का,काल गणना पद्धति का , वर्षाजल संग्रहण पद्धतियों का , ग्राम विकास का, जैवविविधता को नष्ट करने का, प्रशासनिक भ्रष्ट व्यवस्था का , साहित्य एवं कला का और शासन पद्धति का अवलंबन कर रहे हैं, इसका सुक्ष्म अभ्यास करते हैं,तब हमें मालूम पड़ेगा कि हम अब भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का अवलंबन नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम अधिकाधिक पाश्चात्य अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विदेशी भोगवादी नास्तिक जीवनशैली का ही अवलंबन कर रहे हैं, पुरे पाश्चात्य बने हैं, भारतीय नहीं रहे हैं। हम भारतीय स्वदेशी होने का जबरन नाटक drama कर रहे हैं, लेकिन स्वदेशी नहीं रहे, हमारे राष्ट्रीय जीवन में हम पुरे विदेशी बन गये हैं। हमारे पुरातन आध्यात्मिक वैज्ञानिक शतप्रतिशत स्वदेशी भारतीय संस्कृति और सभ्यता में अब एक  पुरी तरह आधुनिक नास्तिक अवैज्ञानिक विदेशी विध्वंसक संस्कृति और सभ्यता घुस गई है । 

            कब तक चलेगा यह हमारे भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का विनाश ? कब तक चलेगी हमारे भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में होनेवाली यह विदेशी पाश्चात्य अप्राकृतिक अवैज्ञानिक नास्तिक अधार्मिक जीवनशैली की अवैध अनैतिक घुसपैठ ? 

       क्या हम हमारी एक बिल्कुल नई अस्सल भारतीय अहिंसक सत्य आध्यात्मिक वैज्ञानिक शतप्रतिशत स्वदेशी जीवनशैली को एवं संस्कृति को और सभ्यता को दोबारा प्रस्थापित नहीं कर सकते, पुरे दुनिया में फैला नहीं सकते ? 

क्यों नहीं ? जरुर कर सकते हैं। लेकिन इस के लिए हम सभी को अपने अपने जाती पंथ धर्म राजनीति और अपनी अपनी विचारधाराओं से उप्पर उठकर परस्पर रचनात्मक सृजनात्मक संवाद करना होगा, लगातार अपने अपने विचारों का और उपलब्धियों का परस्पर आदान-प्रदान करना होगा। 

क्या आप इस के लिए तैयार हो ? कृपया अपनी अपनी जो भी सुस्पष्ट खरी खोटी राय है, उसे अपने पोस्ट और नीचे कमेंट्स द्वारा प्रगट कीजिएगा, यही आपसे मेरी विनम्रतापूर्वक प्रार्थना है। धन्यवाद।

लेख-पद्मश्री सुभाष पालेकर 

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