पंडितों की प्रमुख उपाधि

 देश के प्रमुख पंडित जातियों के कुछ प्रमुख उपाधियों के उपनाम 

पंडित-पंडित शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उपनिषदों में हुआ है, यह विरुद ब्राह्मणों और अन्य वर्गों के विद्वानों के नाम के शुरुआत में लगाने की प्रथा है.

गिरि- गिरि शब्द का अर्थ ‘पर्वत’ पर रहनेवाला होता है. गिर का अर्थ पर्वत होता है. पर्वत को भी गिरि कहते हैं. लेकिन वास्तविक रूप में पर्वत पर रहने वाले लोगों और वहां से निचे आकर रहने वाले उन लोगों की पहचान गिरि के रुप में की गई जो कैलाश पर्वत पर रहने वाले भगवान शिव के सिद्धांतों के प्रचारक के रूप में कार्यरत थे. यहीं कारण हैं कि आज भी कई प्रमुख शिव मंदिरों में मुख्य पुजारी के रुप में गिरि ही दिखते हैं. गिरि बड़े ही पवित्र माने गए हैं.

गोस्वामी–एक धार्मिक व्यक्ति माना जाता है, जिसने अपनी इंद्रिय पर विजय प्राप्त कर लिए हो वास्तव में वहीँ गोस्वामी है. लेकिन गौण रूप से गोस्वामी (गोसाईं) उन गृहस्थों को भी कहते हैं, जो पुनः विवाह कर लेने वाले विरक्त साधू संतों के वंशज हैं.

सोचने की बात है

पुरोहित–पुरोहित को शास्त्र का पुरोधा कहते हैं इसका प्रथम कार्य किसी राजा या सम्पन्न परिवार का यज्ञ या धार्मिक कार्य सम्पन्न करना होता था. लेकिन बाद में जब राजतंत्र समाप्त हुआ तो भी उस परिवार के वंशज को पीढ़ी दर पीढ़ी पुरोहित नाम के उपाधियों से ही पुकारा जाने लगा.

शास्त्री-शास्त्र जाननेवाले को यानि शास्त्र का ज्ञान रखनेवाले को शास्त्री कहते हैं.  

अलवार–दक्षिण भारत की उपासक परंपरा के आधार पर यह ज्ञात होता है कि अलवार विशेषकर श्री वैष्णव संप्रदाय के शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं.

दास–ऋग्वेद में दस्यु के सदृश दासों को देवों का शत्रु कहा गया है. मनुस्मृति से प्राप्त मान्यता के अनुसार दास सात प्रकार के होते थे-जीविका के लिए स्वयं समर्पित, युद्ध में बंदी बनाया हुआ,  अपने घर में दास से उत्पन्न, उत्तराधिकार में प्राप्त, दान में प्राप्त, क्रय किया हुआ और विधि से दंडित मानाजानेवाला दास. 

भारत में जाति धर्म और महात्मा गांधी के माता का सम्प्रदाय

दीक्षित–यज्ञानुष्ठान की दीक्षा लेने वाला व्यक्ति दीक्षित माना जाता है.

आंगिरस–यह आंगिरस परिवार की उपाधि है जिसकी उपाधि कई आचार्यों की है.

पुरी-आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित दस सबसे नामी पंडित संन्यासियों की शाखा है. कुछ विद्वानों के मतानुसार ईश्वरपुरी जैसे वैष्णव संतों द्वारा जगन्नाथपुरी में अधिकांश भजन साधन किया गया, इसलिए उनका उपनाम बाद में पुरी के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

सतनामी इतिहास

शर्मा-वैसे तो प्राचीन धर्म ग्रन्थों के अनुसार सभी ब्राह्मण शर्मा (शर्मन्ह) कहलाते हैं मगर उनके उपनाम समय और काल के अनुसार बदलते रहे हैं. 


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