जय हिंद। वसुधैव कुटुम्बकम।।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी बहुत सी बातें हैं जो दिल को छू जाती हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दिल को छू लेने वाली बातों के बारे में सोचते हुए मुझे लगता है।
कि जब मै स्वयं हाई स्कूल तक था तो लगभग मेरी भी सोच कुछ इसी तरह की हुआ करती थी। देश के लिए कुछ कर गुजरने की, सिर्फ बातों से नहीं बल्कि वास्तविक रूप में.
जिस तरह से परिश्रम करते मै आज पीएम मोदी को देख रहा हूं, ठीक ऐसे ही. देश के लिए अपना दिन रात एक करके लगातार देश सेवा में लगे रहते हुए सभी के भले के लिए अपना जीवन समर्पित करके, अथक प्रयास से देश सेवा करने की.
लेकिन उस दौरान जब 1999 में मै मैट्रिक जैसे हीं पास हुआ। तभी अचानक से मेरे पिता की मृत्यु ने मुझे परिवार के बारे में भी सोचने को मजबूर कर दिया। देखते हीं देखते उन सब बातों से मेरा कितना समय निकल गया मुझे पत्ता भी नहीं चल पाया।
मै उस दरम्यान सामाजिक से ज्यादा पारिवारिक जिम्मेदारियों में हीं उलझता चला गया। पत्ता नहीं उस दरम्यान मेरे जीवन के लगभग दो से भी ज्यादा दशक कैसे बीत गए। कुल मिलाकर नहीं ठीक से समाज सेवा और नाहीं परिवार के लिए सही कुछ कर पाया.
आज मै समाज और परिवार दोनों से दूर रहना अच्छा समझने लगा हूं। लिखने में इतना मन लगने लगा है कि मेरे कई साल सिर्फ अपने मन की बातों को लिखने में गुजर जाएं तो भी पत्ता नहीं मै उन्हें अकेले स्वयं लिख भी पाउंगा या नहीं।
अब मै रोज़ाना घंटों लिखते रहता हूं। ऐसा लगता है अगर मै पूरी जिंदगी लिखते रहूं। तो भी मेरे मन की बातें मै इस जीवन में पूरी तरह से नहीं लिख पाउंगा।
लिखने में आजतक मेरा इतना समय बीत चुका है कि आज मेरे समझ में मुझे ऐसा लगता है। कि अब तो मेरे पास गंवाने के लिए भी कुछ और नहीं बचा हुआ है।
यहां तक कि वैसा समय भी नहीं अब नहीं बचा जिसमें मैं स्वयं को कुछ समय के लिए खाली समझकर यूं ही कुछ कुछ लिखा करता था. आज मै बेचैन होकर लिखता हूं. कुछ लिखने के लिए मजबूर हो जाता हूं इसलिए लिखता हूं.
हां, मगर आज मेरे पास जो सबसे आखिरी चीज़ कुछ गंवाने के लिए है भी तो वह मेरे जीवन के वे सभी कड़वे अनुभव हैं। जो अब मुझे इस बात का अहसास कराती हैं कि तूने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से एवं अपना कहे जाने वाले रिश्तों के हिसाब से, तो जीवन जी लिया।
मगर अब शेष समय अपने मन की सुनो एवं स्वयं अपने व्यक्तिगत अनुभव को साकार करने में लगाओ। आज मेरा जन्मदिन है। आज मै चालीस वर्ष का हो चुका हूं।
अबतक मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि जितना समय निकल गया। अगर इतना हीं और बच गया हो तो इन शेष चालीस वर्षों में मेरे माध्यम से क्या कुछ नहीं किया जा सकता है।
इन बीते समयों का लगभग यहीं अनुभव प्राप्त करने में कितनों की तो पूरी जिंदगी ही लग जाती है। अब गीता की एक यह बात मुझे बार-बार याद आती है, कर्म करो फल की चिंता मत करो।
इस विचार को पहले मै नहीं समझ पाता था। अर्जुन के तरह मेरे मन में भी यहीं ख्याल आते थे कि फल की चिंता के बिना भी भला कोई अपना कर्म कैसे कर सकता है! क्या यह सम्भव है कि कोई फल की इच्छा के बिना भी अपना कर्म कर सके?
आज मुझे भगवान श्रीकृष्ण की वह बात समझ आ चुकी है। कर्म करो तुम ज्ञान से, श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म। वास्तव में जबतक हम सभी को एक समान नजरों से नहीं देखते तबतक हम अपने वास्तविक धर्म से दूर हीं रहते हैं।
अपना पराया मन से मिटा दो विचार से हटा दो फिर सब तुम्हारा है तुम सबके हो। जय हिंद। वसुधैव कुटुम्बकम।।
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