क्या हमारा देश गुलामी से स्वतंत्र हुआ है

 डॉ सुभाष पालेकर

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ता 15 अगस्त 2023

विषय .. क्या हमारा देश गुलामी से सचमुच स्वतंत्र आजाद हुआ है? 


साथियों और बहनों,

हमारे देश के स्वतंत्रता दिवस के वर्धापन दिन के उपलक्ष में आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयां। मैं आपको एक गंभीर सवाल करना चाहता हूं कि क्या हमारा भारत देश गुलामी से आजाद हुआ ? कौन-सी आजादी ? हां यह मैं मानता हूं कि हमें ब्रिटिशों से प्रादेशिक आजादी मिली, हमें ब्रिटिशों ने उनके प्रादेशिक साम्राज्य से मुक्ति दियी, लेकिन क्या हम ब्रिटिशों के यां युरोपीयन देशों के शोषणकारी विध्वंसक आर्थिक साम्राज्य वाद से मुक्त हुएं ? नहीं। अभी भी हमारे देश में उसी शोषणकारी युरोपीयन अमेरिकी पाश्चात्य अर्थव्यवस्था लागू है जो ब्रिटिशों के शासन में चल रही थी , जिससे हमारे देश की और ज्यादा आर्थिक लूट हो रही है,इस लूट को हम आयात कहते हैं। क्या यही हमारी आर्थिक आजादी है? क्या हम युरोपीयन सांस्कृतिक साम्राज्य से मुक्त हुएं हैं? बिल्कुल नहीं! आज हमारे देश के अधिकांश नागरिक भारतीय संस्कृति की पहचान होने वाले धोती कुर्ता पहनना लगभग भूल गए हैं और अपने शरीर पर युरोपीयन सांस्कृतिक चिन्ह होने वाले फुल पैंट और टी-शर्ट एवम मनीला पहन रहे हैं और हमारी माता बहने हमारी सांस्कृतिक धरोहर होने वाली साडी पहनना लगभग भूल गई है,और मध्य एशिया का पहनावा पहन रहीं है। क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? आज बच्चों को बचपन से नर्सरी से लेकर स्नातकोत्तर महाविद्यालयीन शिक्षा विदेशी अंग्रेजी भाषा में दियी जा रहीं हैं, जो दुनिया की सबसे दरिद्री भाषा है। आज बचपन से हमारी भारतीय मातृभाषा में पढ़ना लिखना जैसे अपराध माना जा रहा है। इससे अगली पीढ़ी मातृभाषा को भूल जाएंगी, सिर्फ अंग्रेजी में बोलेगी,जो साम्राज्य वादी ब्रिटिश चाहते थे, वहीं हम कर रहे हैं। क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? ब्रिटिशों ने अपना प्रशासन चलाने के लिए भारत में बाबू लोगों की फौज निर्माण करने वाले मेकैले प्रणित अभ्यास क्रम माने सिलेबस शैक्षणिक क्षेत्र में लागू किए जो आज भी जैसे है वैसे चल रहे हैं। इससे बेरोजगार बाबू लोगों की विशाल फ़ौज तैयार हो रही है, जिन्हें परिवार चलाने के लिए आवश्यक आमदनी देने वाला हुनर कौशल मालूम नहीं, क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? हमारे भारतीय सांस्कृतिक आध्यात्मिक सामाजिक त्योहारों को शहरी भारतीय उच्च शिक्षित लोग लगभग भूल गए हैं और घर घर में ब्रिटिश क्रिसमस-डे नाताल मना रहे हैं।  क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? पुरे भारत में आज हमारे भारतीय हमारे पुरातन सौ प्रतिशत वैज्ञानिक कबड्डी खो-खो लगोरी जैसे शरीर को सर्वोच्च व्यायाम देने वाले खेल कुद लगभग भूल गए हैं और ब्रिटिशों ने हमारे देश में लाये ब्रिटिश क्रिकेट हाॅकी खेल हमारे मैदानों पर और हमारे मन-मस्तिष्क पर पुरी तरह हावी हो गये है। क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? हमारे भारतीय संस्कृति में जन्म दिन मनाते समय आरती में दिये जलाकर बच्चों का औक्षण होता था, ताकि उसका भावी जीवन प्रकाशमान हो।आज हर घर में जन्म दिन मनाते समय मोमबत्ती के प्रकाश को फूंक मारकर बुझाया जाता है । क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? शोषणकारी युरोपीयन अमेरिकी पाश्चात्य बौद्धिक व्यवस्था ने हमारे देश पर हमारी देशी गोमाता को समाप्त करके विदेशी जर्सी होल्सटीन जैसे विदेशी काऊ वंश, सौ प्रतिशत विदेशी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक रासायनिक खेती और जैविक खेती, हमारे सर्वोत्तम देशी बीजों को समाप्त करके उनके जगहों पर विदेशी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक संकर बीज और जननूक रुपांतरित बीज genetically modified seeds, हमारे पुरातन सर्वोत्तम जड़ी बूटी और आयुर्वेदिक पद्धति को समाप्त करके विदेशी अवैज्ञानिक अप्राकृतिक एलोपैथिक चिकित्सा, ये सारे पाश्चात्य विनाशकारी कर्मकांड हम पर जबरन थोंपे है और हम अब उनके आदी हो गए हैं। क्या यह भारतीय सांस्कृतिक आजादी है? ब्रिटिश हमारे भारत में आने के पहले हर भारतीय नागरिक अपने दैनंदिन जीवन में दातून के लिए घर में तैयार किया दन्तमंजन अथवा देशी गोमाता के सुखे कंडी को जलाकर मिली राख का उपयोग करते थे,जो सौ प्रतिशत वैज्ञानिक हैं। आज भारत के घर घर में विदेशी दातून साहित्य अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी टुथ ब्रश और टुथ पेस्ट का उपयोग हो रहा है, परिणाम स्वरूप हर शहर में गली गली में दांतों के डाक्टर डेंटल हाॅसपीटल लगायें बैठे हैं। क्या यह स्वदेशी है , कौन कहता है स्वदेशी हैं? क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? ब्रिटिश हमारे भारत में आने के पहले स्नान करते समय किसी भी साबू का उपयोग नहीं करते थे,किसी भी अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग नहीं करते थे। साबू और सौंदर्य प्रसाधन कैसे होते है उन्हें मालूम भी नहीं था, ब्रिटिशों ने यह अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी साबू और सौंदर्य प्रसाधनोंको भारत में लाया और हमपर जबरन थोंपा।आज घर घर में स्नान करते समय विदेशी ब्रिटिश साबू लगाया जाता है और सौंदर्य प्रसाधनोंको उपयोग में किया जाता है। क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? ब्रिटिश हमारे भारत देश में आने के पहले हर कोई भारतीय नागरिक कपास के धागे से बना और हमारे गांव के बुनकरों ने बुना सौ प्रतिशत प्राकृतिक वैज्ञानिक सुती खादी कपड़ा पहनते थे, उन्हें विदेशी अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी पाॅलिएसटर कपड़ा मालूम भी नहीं था । आज भारत के घर घर में भारतीय लोगों के शरीर पर यह सौ प्रतिशत अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी पाॅलिएसटर कपड़ा पहनाया गया है। क्या यह हमारी सांस्कृतिक आजादी है? गो आधारित खेती, जैविक खेती organic farming और रासायनिक खेती, तीनों सौ प्रतिशत विदेशी अप्राकृतिक अवैज्ञानिक विनाशकारी शोषणकारी कृषि पद्धतियां है, जिनका अमल और प्रचार भारतीय किसान, सरकार, कृषि वैज्ञानिक और भारतीय विद्वान कर रहे हैं और जो हमें, हमारे भुमी जल पर्यावरण और जैवविविधता को नष्ट कर रही है । और आश्चर्य माने हमारे देश के बौद्धिक आतंकवादी इन सौ प्रतिशत विदेशी जैविक खेती को स्वदेशी कह रहे है , बड़े दुख पीडा की बात है कि भारत में इस विदेशी विनाशकारी विध्वंसक अप्राकृतिक अवैज्ञानिक जैविक खेती का विश्व विद्यालय organic farming University गुजरात  में स्थापित किया गया हैं और दूसरी तरफ सौ प्रतिशत स्वदेशी शोषण मुक्त, जीव जमीन पानी पर्यावरण और जैवविविधता को उनके विनाश से बचाने वाली समृद्ध संपन्न बनाने वाली सुभाष पालेकर कृषि को युद्ध स्तर पर कडा विरोध हो रहा है । क्या यह हमारे महान भारत देश की बौद्धिक आजादी है ? कहां है हमारी सांस्कृतिक शैक्षणिक सामाजिक बौद्धिक और आर्थिक आजादी? अब समय आया है, इस संपूर्ण विदेशी गुलामी से पुरी तरह मुक्ति प्राप्त करें और हमारे प्यारे भारत देश को सभी तरह की गुलामी से मुक्त करके भारत माता को आत्मनिर्भर बनाये। क्या यह संभव है? हां, सौ प्रतिशत संभव है। इसको संभव बनाने के लिए हमें हमारे जाति पंथ धर्म राजनीति और विचारधारा से उप्पर उठकर परस्पर रचनात्मक सृजनात्मक संवाद करना चाहिए, आपस में परस्पर सृजनात्मक विचारों का और आचारों का आदान-प्रदान होना चाहिए, और अंतमे सौ प्रतिशत स्वदेशी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का नवनिर्माण करना चाहिए। हम इस दिशा में हमारे सिमित संसाधनों के बल पर आगे बढ़ रहें हैं, आप भी आगे बढ़े, मिल जूल कर आगे बढ़े। आत्मनिर्भर भारत निर्माण करना कठीण जरुर है लेकिन असंभव नहीं। धन्यवाद।

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