पद्मश्री सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन
पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर
सुभाष पालेकर कृषि जन आंदोलन छह सिद्धांतो के पहियों पर चलता है ... ज्ञान विज्ञान सत्य अहिंसा धर्म और जैवविविधता। प्रकृती ईश्वर निर्मित ईश्वरका सगुण साकार रूप है, प्रकृति ईश्वरीय संविधान हैं। पहले प्रकृति आई, बादमें मानव पृथ्वी पर ईश्वर द्वारा भेजा गया है। माने प्रकृति की निर्मिती करने वाला मानव नहीं है। अर्थात प्रकृति माने घने जंगल में जो भी अस्तित्व में हैं, उसे स्वीकारना ही आध्यात्म है। प्रकृति में अग्नि होत्र का अस्तित्व बिल्कुल नहीं है, माने ईश्वर अग्नि होत्र को नकारता है, अर्थात अग्नि होत्र ईश्वर के व्यवस्था के विरोध में है, इसलिए वह नास्तिकता है, और कोई भी आध्यात्मिक मानव इस नास्तिकता को स्वीकार नहीं कर सकता। अगर आप को हमारे जन आंदोलन के सिद्धांत मान्य नहीं है, तब वह आपका संवैधानिक अधिकार है।
लोग घने जंगलों में माने ईश्वर निर्मित प्रकृति में स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए और शुद्ध हवा लेने के लिए जाते हैं, अधिकांश प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र प्रकृति की गोद में होते हैं। क्यों ? प्रकृति में अग्नि होत्र नहीं है, फीर वहां की हवा शुद्ध और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक क्यों है? क्यों कि वहां पेड़ पौधे होते हैं जो हवा में प्राणवायु छोड़ते हैं,हवा मे से प्रदुषकों को सोंख लेते हैं, हवा को शुद्ध करतें हैं। हवा को शुद्ध करना है तो पेड़ पौधों के जंगल खड़े किजिए, इसके लिए अग्नि होत्र जलानें की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। एक चालीस साल का पेड़ एक साल में 776 किलो प्राणवायु उत्सर्जित करता है, अग्नि होत्र हवा में से प्राणवायु को नष्ट करता है। दिन में अशुद्ध चौबीस घंटे हवा बहती है, अशुद्ध हवा को शुदध करने के लिए क्या आप खेत में चौबीस घंटे अग्नि होत्र जलाते रहेंगे? क्या आपको खेती के, परिवार के और समाज के दुसरे कोई काम नहीं है? अगर अग्नि होत्र कर्म काण्ड ईश्वर को मान्य नहीं है तब आप ईश्वर के विरोध में बगावत क्यों करते हो?
आपको अग्नि होत्र का प्रचार करने का संवैधानिक अधिकार संविधान ने दिया है, हम इसका स्वागत करते हैं। लेकिन अग्नि होत्र का प्रचार करने का माध्यम हमारा जन आंदोलन नहीं है।
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