तिवारी कौन है

 तिवारी कौन है? 

मेरा नाम आलोक कुमार तिवारी है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आलोक तो मेरा नाम है और इसमें लगे हुए कुमार शब्द से यह साबित हो जाता है कि मै नर हूं इसलिए चलो यह तो ठीक रहा।

क्योंकि ये नर और मादा नाम की जो दो जातियां हैं इनका अस्तित्व तो है और यह हमेशा रहेगा।

मनुष्य के विकास के लिए भी या फिर इनके नहीं होने पर भी दूसरे किसी और जीव के रूप में भी या फिर उन सबके विकास के लिए भी जिनकी उत्पति लिए किसी नर और मादा का अस्तित्व भी है।

क्योंकि इन दोनों के मिलने से हीं फिर किसी नर या मादा का जन्म लेना संभव भी होते रहा है, जिनसे नई-नई उत्पतियां होते रही हैं।

इसलिए कुमार और कुमारी जैसे शब्दों का अस्तित्व और इसका मतलब भी समझ में तो आ जाता है। लेकिन इसके बाद भी फिर ये हमारे नाम के अंत में तिवारी का मतलब भी क्या है? अब मै इस पर आता हूं।

बचपन में हमने समझा कि हमारे पिताजी, दादाजी और परदादाजी सभी अपने नाम के अंत में तिवारी लगाते आए। मैंने अपने दादा जी से पूछा कि दादाजी ये तिवारी क्या है।

उन्होंने हमें बताया कि यह हमारी जाति है ब्राह्मण में तिवारी एक जाति है।

मैंने फिर पूछा तिवारी जाति है तो फिर हिन्दू क्या है उन्होंने बताया-यहीं तो हमारा धर्म है।  लेकिन तब मै बच्चा था  इसलिए ये बात भी मान गया। 

मैंने आगे इससे सम्बंधित कोई अन्य प्रश्न तब उनसे नहीं किया चूकि बचपन से हीं मुझे जो संस्कार मिले उनकी बदौलत हीं धर्म शब्द के लिए तभी से मेरे मन में काफी ज्यादा इज्जत भी रहती आई।

चाहे वह धर्म हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन या कोई और भी धर्म क्यों न हो। सभी के लिए मेरे मन में तभी से एक समान इज्जत रहे।

लेकिन आज फिर भी मेरे मन में इससे सम्बंधित कई अन्य सवाल भी उठने लगे हैं।

मै अब इसे समझने की कोशिश में हूं कि क्या कोई मुझे अब यह भी बताएगा कि वास्तव में मैं इन सबमें से असल में कोई एक कौन हूं ? मनुष्य हूं ? नर हूं ? हिन्दू  हूं ? तिवारी हूं? ब्राह्मण हूं ?  

वास्तव में मै इनमें से कोई एक असल में क्या हूं ? अगर ब्राह्मण और उसमे भी तिवारी जाति से हूं तो क्या ये जाति भी जन्म से हीं होती है ? जन्म से होती है तो सबसे पहले किस जाति का जन्म हुआ ?

मैंने इसका अध्ययन किया तो पता चला कि जाति तो हमारे कर्म के आधार पर हीं मानव के विकास और उसके रोजगार के उद्देश्य से हमारे पूर्वजों ने बनाई 

तो फिर अगर कर्म के आधार पर हीं मानव के विकास और रोजगार के लिए जाति बनाई गई थी।

तो फिर आज इस तरह से जाति के नाम पर मानव जीवन का हनन भी क्यों होने लगा है। आज जातिभेद जन्मजात कैसे हो गई है.

ऐसे में आज इसके होने पर या इसके होते हुए भी नहीं रहने के समान होने पर इसीके नाम पर फिर से किसी नए-नए आधार और रचना की जरूरत भी है क्या ?

जैसेकि आज के ताजे परिपेक्ष्य में किसी डॉक्टर, इंजीनियर और वकील वगैरह नाम की जातियां भी होनी चाहिए क्या, और क्या अब फिर से इस बात पर भी बहस करने की जरूरत है ?

धर्मों और जातियों के जंजाल में फंसा भारत

तब फिर से इससे आगे इससे जुड़े हुए कई अन्य सवाल भी खड़े होने लगते हैं। मानना होगा कि आज हम-सब अपने आप को काफी समझदार भी मानने लगे हैं।

दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली नई-नई चीजों का आविष्कार करने लगे हैं, लेकिन इसका उपयोग कब होगा जब केवल एक मनुष्य जाति रहेगी तभी तक न?

क्योंकि आज तो हरेक तरफ अमन-चैन को छीननेवालों की पार्टी बनने लगी है। कोई हिन्दू का नेता तो कोई मुस्लिम का नेता , कोई क्रिश्चन का नेता तो कोई सिख का नेता।

बचपन में समझा था हिन्दू - मुस्लिम - सिख - ईसाई आपस मे है भाईभाई बाद में सभी को आपस में लड़ते हुए भी समझा।

आज इन सबों में कोई अगड़े का नेता तो कोई पिछड़े का नेता बनने लगा है।  चंद मुट्ठी भर लोग जाति और धर्म के नाम पर पूरे मनुष्य जाति को तहस- नहस करने में लगे हैं।

जबकि वास्तव में अब इसका सही आधार तक भी नहीं बचा हुआ है। और क्या यह भी नहीं लगता कि अब हम इसी के नाम पर मनुष्य हीं नहीं बल्कि पशुओं की जाति से भी बदतर होते जा रहे हैं।

फिर भी इस बात की संतोष किए जा रहे हैं कि हमारा विकास हो रहा है, हमारे धर्म का विकास हो रहा है, हमारे जाति की विकास हो रही है, वगैरह वगैरह।  Root cause and permanent solution of Haryana violence.

हमें सबसे पहले केवल अपने मनुष्य-जाति के जीवन के बारे में हीं सोचना होगा। और आज के परिदृश्य में फिर से  उनके समस्त जीवन-चक्र के बारे में भी सोचना होगा

अब ये जीवन-चक्र क्या है ? यह तो आपको पता है ? अगर नहीं पत्ता है तो फिर इसे भी समझने की जरूरत है।

क्योंकि यह हमारे मनुष्य जाति और धर्म से भी सम्बंधित है। जिनमें और सभी जीवों की भी इससे सम्बंधित एक अपनी विशेष अहमियत भी दिखती है।

अंत में एक और प्रश्न आप कहां तक पढ़े हो ये तो आपको मालूम होगा। लेकिन अब आपके पढाई की क्या अहमियत है यह भी आपको पता है क्या ?

आप ज़रा इस बात पर भी गौर कर लेना यह भी आप हीं का कर्म और धर्म भी है और यहीं आपकी जाति भी तय कर सकता है।

क्योंकि देश और समाज का चौथा स्तम्भ भी जिसके भरोसे आप बैठे हो और जिस मीडिया पर आप सबसे ज्यादा भरोसा करते हो।

वह चौथा स्तम्भ भी स्वयं अपने टी. आर. पी. की चक्कर में आज केवल एक अर्थ पर आधारित किसी व्यवस्था के रूप में हीं खूद लड़खड़ाने लगा है

अब वह भी आज के ब्राह्मणों की तरह किसी बौद्धिक सम्पदा की बजाय केवल किसी अर्थ-निर्माण को हीं महत्व देने में लगा हुआ है।

जबकि हमें सोचना यह भी चाहिए कि अगर हमारे समाज में बौद्धिक सम्पदा ही नहीं बचेगी तो फिर अर्थ का भी तब क्या मतलब होगा।

अर्थ को अर्जित करने वाले अगर जिन्दा नहीं रहेंगे तो फिर इसको अर्जित करने का भी किसी को क्या फायदा होगा

Haryana Mewat News Hindi Analysis Violence In Haryana's NUH During Religious Procession

शायद इसीलिए केवल एक ये बात हीं मेरे संस्कार में मेरे पूर्वोजों ने  शुरू से डाले जो कि मेरे अंदर अब बिल्कुल हीं घर कर चुकी है –हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई आपस में हैं भाई-भाई।

इसके अलावा भी अगर हम और सभी जीवों के साथ भी सामंजस्य बना सकें तो सही मायने में हमारा इससे बड़ा कोई और धर्म भी नहीं हो सकता है।

अंत में वह एक सवाल ये तिवारी कौन है? अब भी मेरे जेहन में बना हुआ है। जिसका उत्तर हम सभी को एक साथ मिलकर तैयार करना चाहिए ऐसा लगता है। 

आलोक कुमार तिवारी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सबसे तेजी से पैसे कमाने के कुछ तरीके जानें

स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता

शिव ध्वज फहराकर सबने की बुराइयों से मुक्त होने की प्रतिज्ञा