KISAN EK YODHA

 

किसान एक योद्धा

मोहन नाम के एक गरीब किसान व्यक्ति के पत्नी को बाझ समझकर उसकी मां उससे कहती है, मोहन बेटा अगर मेरी मानो तो तुम अब अपनी दूसरी शादी हीं कर लो। ताकि पहली पत्नी से ना सही मगर तब तुम्हारे किसी दूसरी पत्नी से हीं कोई बच्चा भी तो हो जाए। किसी भी तरह से तुम्हें कोई बच्चा हो जाएगा तो हमारा वंश तो डूबने से बच जाएगा। मगर मोहन नाम का वह गरीब किसान व्यक्ति अपनी मां को स्वयं ऐसा करने से मना करते हुए कहता है। मां हम गरीब लोगों को अपना वंश चलने या ना चलने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। अगर हमें कोई बच्चा हो भी जाए तो भी उसका अपना पेट भी तो भूपेंदर बाबू के यहां मेहनत और मजदूरी करने से हीं न भरेगा। तो फिर ऐसे गरीबी का वंश चलाने का हमें ऐसा फायदा भी क्या है, जिसके लिए तुम इतनी ज्यादा चिंता भी कर रही हो। तब इस बात के जवाब में उस व्यक्ति की मां उससे कहती है, मोहन बेटा मगर हराम के खाने से तो अच्छा हीं होता है न मेहनत मजदूरी करके खाना। और मेहनत मजदूरी करना हीं तो हम गरीब किसान लोगों का धर्म भी होता है न बेटा। हम गरीब किसान अगर किसी भी तरह से आज भी अगर अपने धर्म का पालन कर रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है। तभी सोहना नाम का वह गरीब व्यक्ति अपनी मां से कहता है। मां मेहनत मजदूरी करना हम गरीब लोगों का धर्म नहीं है, बल्कि यह हमारी एक मजबूरी है। जिसके बिना हमारा पेट तो कभी भर हीं नहीं सकता है। अब तुम हम हीं को देख लो जब से होश संभाला तभी से मेहनत मजदूरी भी करने लगा। लेकिन इससे हमें अब तक मिला भी तो क्या सिर्फ यह सब मजबूरी हीं न टूटे हुए घर फटे हुए कपड़े दो वक्त की रोटी वह भी कई पुश्तों से लगातार बिना थके हुए रोज रोज दिन रात काम करके इतनी जिंदगी बिताने के बाद। मां इस मेहनत मजदूरी से कुछ नहीं होनेवाला। मां या कैसी जिंदगी हम जी रहे हैं आज भी भूपेंदर बाबू के यहां काम किए वगैर हमारे घर का चूल्हा कभी एक शाम के लिए भी नहीं जल सकता है। फिर उस गरीब किसान व्यक्ति मोहन की मां कहती है, मोहन बेटा लेकिन इस दुनिया में ऐसा तो नहीं है कि हम हीं अकेले ऐसे लोग हैं, जो अपना पेट रोज किसी के यहां मेहनत मजदूरी करके हीं भरते हैं। बल्कि हमारे जैसे लोगों से हीं तो ये पूरी की पूरी दुनिया भी भरी हुई है। ऐसे लोग तो इस दुनिया में कम हीं हैं जिन्हें अपना जीवन जीने के लिए किसी के यहां काम करने की जरूरत भी नहीं होती है। जैसे अपने गांव के भूपेंदर बाबू के घर में जन्में सभी लोग। तभी मोहन कहता है, हां मां मै भी यहीं कहना चाह रहा था कि एक भूपेंदर बाबू के घर में जन्म लेने वाले लोगों का भाग्य देखो। वहीं हमारे जैसे घर में जन्में लोगों का भाग्य देखो। वाह मां भाग्य भी क्या चीज होती है। और हां मां भाग्य के बल पर हीं किसी अमीर व्यक्ति के यहां भी कोई जन्म भी लेता है। तभी सोहन की मां उससे कहती है कि भूपेंदर बाबू के बेटे ज्ञानेंद्र बाबू अब बाप बनने वाले हैं। उनके कनिया का रोज आज-कल लगा हुआ है। तब मोहन नाम का यह गरीब किसान व्यक्ति अपनी मां से अचानक से हँसते हुए कहता है। मां मै तो सिर्फ तुम से मजाक में यह सब बात भी कह रहा था। क्या करुँ मां जब से होश संभाला तभी से मेहनत मजदूरी करते करते मन में कई बार कुछ भड़ास पैदा होने लगता है। लगता है काश मै भी किसी तरह से कुछ पढ़ाई लिखाई कर लिया होता कम से कम रोज रोज मेहनत मजदूरी करने के लिए हीं इतना मजबूर भी तो नहीं होता। मां मै किसी और से तो यह सब कुछ बात कह नहीं सकता है बस कभी कभी जब बाबू जी की याद आती है तो तुम से हीं कुछ बोलकर अपने मन की वह भड़ास भी निकाल लेता हूँ। बाबू जी के मरने के बाद बचपन से काम करते करते कभी कभी मेरा भी मन कुछ उदास हो जाता है। लेकिन मां तुम देख लेना हम अपने बच्चे को खूब पढ़ाएंगे कुछ भी हो जाए चाहे वह बेटा हो या बेटी हम उसे पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। मां तुम बिल्कुल सही बोल रही थी हम मजदूर किसान लोगों का मेहनत हीं हमारा धर्म भी होता है। हा मां अब तुम भी दादी बनने वाली हो। तभी मोहन की मां उससे कहती है, तो फिर तुम ने मुझसे ये बात अबतक छुपाई क्यों। अपनी मां के इस सवाल के जवाब में मोहन कहता है, माँ, क्योंकि हम तुम्हे ये खुशी अचानक देना चाहते थे। तभी मोहन नाम का वह किसान कहता है ठीक है मां तो अभी मुझे फौरन हीं तुम्हारे उस पतोहू के पास अपने ससुराल जाना होगा। तुम जल्दी से कुछ बना दो ताकि मै कुछ खा-पीकर आज अपने ससुराल के लिए निकल जाऊं। क्योंकि वहां इस मौके पर मेरे ससुराल वाले मेरा भी इंतजार कर रहे होंगे। जिसके बाद पहले इस इलाके के सबसे अमीर आदमी भूपेंदर बाबू के घर में एक लड़का जन्म लेता है। जिसका नाम भूपेंदर बाबू स्वयं हीं प्रिंस भी रख देते हैं। ताकि बड़ा होकर उनका पोता अपना जीवन राजकुमार की तरह जी सके। और दूसरी तरफ मोहन को भी एक लड़का हीं होता है जिस बच्चे का नाम किसान रखा जाता है। मोहन अपने बेटे का नाम किसान इसलिए रखता है ताकि उसका बेटा भी बड़ा होकर और एक किसान बन सके। मोहन के पत्नी के साथ उसका बेटा किसान भी अपने गांव लौटता है और दोनों का लालन-पालन शुरू हो जाता है। प्रिंस नाम के बच्चे का लालन-पालन राजसी ठाठ बाठ के अनुसार होता है। जबकि उसी गांव में किसान नाम के इस बच्चे का लालन-पालन गरीबी में जीवन जीने वाले एक आदमी के बच्चे की तरह होता है। प्रिंस और किसान जैसे जैसे बड़े होने लगते हैं धीरे धीरे दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती भी होने लगती है। प्रिंस के पिता उसे पढ़ाई करने के लिए बाहर भेजने की बात कहते हैं प्रिंस के बारे में यह सब बात सुनकर किसान बहुत उदास हो जाता है। वह सोचता है काश वह भी अपनी पढ़ाई करने के लिए प्रिंस के साथ बाहर जा पाता। प्रिंस भी अपने बचपन के दोस्त किसान के बारे में यहीं बात सोचता है कि काश मै किसान को भी अपने साथ पढ़ाई के लिए बाहर ले जा पाता। लेकिन प्रिंस जब यह सब बात अपने पिता से कहता है प्रिंस का पिता ज्ञानेंद्र उसे डांटता है और कहता है वह सब हमारा मजदूर है हमारे खेत में घर में काम करने वाला है उहो सब पढ़ लेगा तब हमारे घर में और खेत में काम कौन करेगा। जिसके बाद प्रिंस अपनी पढ़ाई करने के लिए बाहर चला जाता है। दूसरी तरफ किसान गांव में हीं रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करता है। जिसके बाद कृषि से जुड़े हुए कुछ रोजगार में लगता है, और अपने ईलाके के कई किसानों का भारी फायदा कराते रहता है। दूसरी तरफ प्रिंस पढ़ाई पूरी करते हुए बाहर के दोस्तों के साथ दोस्ती निभाते हुए दिखता है। वह बाहर रहकर पढ़ाई करने से ज्यादा मौज-मस्ती करने में ज्यादा समय बिताता है। दूसरी तरफ किसान गांव में रहकर भी एक दूसरे का साथ देनेवाला एक दूसरे को रास्ता दिखाने वाला फायदा पहुंचाने वाला सभी का मार्गदर्शन करनेवाला बनता है। किसान गाँव के ईलाके में धीरे धीरे बहुत प्रसिद्धी पाने लगता है जबकि प्रिंस बाहर रहकर भी धीरे धीरे गलत संगत में पड़कर नशा और कई बुरी आदतों का शिकार होने लगता है। क्रमशः ..अगले अंक में             

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