MEHRAULI KA BHULBHULAIYA

 दिल्ली के महरौली में स्थित भूलभूलैया का इतिहास 

हम आपको इस लेख के माध्यम से दिल्ली के महरौली में स्थित एक ऐसे भूलभूलैया का इतिहास बताने जा रहे हैं। जिसके इतिहास से जुड़ीं कई ऐसी बातें हैं जो आपको इस लेख द्वारा जानने को मिलेंगीं वह आपके लिए काफी शिक्षाप्रद और दिलचस्प भी हो  सकती हैं। 

जीहां दोस्तों अब आईए बिना देर किए उन सभी इतिहास को जानने की शुरुआत करते हैं।

 दोस्तों महरौली के भूलभूलैया से जुड़ी एक बात यह की जाती है कि भूलभूलैया के नीचे से होकर एक सुरंग निकली हुई है जो दिल्ली के बिल्कुल बीचोबीच से होकर निकलती है। 

कहा जाता है कि एक बार जब एक बारात इस के उस सुरंग से होकर जा रही थी तो वह पूरी बारात हीं भूलभूलैया के नीचे से निकली हुई उस सुरंग में हीं गायब हो गई थी जिसके बाद से हीं इस जगह का नाम भूलभूलैया पड़ गया। 

महरौली के इस भूलभूलैया के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां पर अकबर और उसके धाय मां के पुत्र आदम खान के बचपन का कुछ दिन भी बिता हुआ था। जिसे अकबर के धाय मां का पुत्र होने के नाते अकबर का भाई भी कहा जाता था। 

कहा जाता है कि अकबर का पिता हुमायूँ अकबर को बुरी नजर से बचाने के लिए उसके जन्मतिथि एवं नाम में बदलाव करने के साथ साथ बचपन में उसके पालन पोषण के बीच कई उसके रहने वाले स्थानों में भी परिवर्तन करते रहा था। 

जिसके कारण अकबर का बचपन कई अलग अलग जगह पर बिता।  अकबर का जन्म राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल उमेरकोट में, जो कि आज पाकिस्तान के सिंध में पड़ता है 23 नवम्बर पंद्रह सौ बयालीस (1542) में हुआ था। 

तब हुमायूँ अपनी हाल की विवाहिता बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल में शरण लिए हुए था। लेकिन बाद में शेरशाह सूरी के कारण हुमायूँ को स्वयं फारस में अज्ञातवास के रुप में रहना पड़ा। 

लेकिन इस बीच वह अपने पुत्र अकबर को अपने साथ नहीं ले गया। वह अकबर को रीवां के एक गांव मुकुंदपुर में छोड़ दिए था जो मध्य प्रदेश में पड़ता है। ताकि किसी भी तरह से अकबर की जान बची रहे। 

जिसके बाद पंद्रह सौ पैंतालीस (1545) से अकबर के बचपन का कुछ दिन कंधार में और फिर काबुल में भी बिता। लेकिन बचपन में अकबर जब सफावी सम्राज्य में जो वर्तमान अफगानिस्तान में पड़ता है अपने चाचा मिर्जा अस्करी के यहां रहने लगा। 

तब हुमायूँ की अपने भाईयों से नहीं बनती थी और हमेशा कुछ न कुछ बात को लेकर ठनी हीं रहती थी जिसकी वजह से कहा जा सकता है कि अकबर की स्थिति भी उसके चाचा के यहां एक बंदी से कुछ ही अच्छी भी रह गई थी। 

इस तरह से जन्म से लेकर तबतक जबतक अकबर आठ साल का हुआ उसका दिन भारी अस्थिरता के बीच बिता। इस बीच अकबर की रुचि शिक्षकों से पढने में भी ज्यादा नहीं रही। बचपन में अकबर की रुचि कूत्ते पालने,घुड़सवारी और कबूतर बाजी में हीं ज्यादा दिखती थी। 

इनके अलावां बचपन के दिनों में अकबर शिक्षकों की बात से अलग हटकर किसी और तरह की ज्ञान हासिल करने में हमेशा अपनी रुचि दिखाता था। अकबर के जीवन में एक बड़ा महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के उत्तराधिकारी के विवादों से उत्पन्न अराजकता जैसी स्थिति के अवसर का लाभ उठाकर उसके पिता हुमायूँ ने 1555 में दिल्ली पर फिर से आक्रमण करके पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लिया।

इस बीच अकबर महरौली के इस भूलभूलैया में अपने दूधमाता माहम अनगा और उसके बेटे आदम खान के साथ भी रहा था यह बात भी कही जाती है। लेकिन इसके कुछ ही महीने बाद जब हुमायूँ अड़तालीस (48) साल का था तब दिल्ली के पुराने किले के इस भवन की सीढ़ीयों से उतरते वक्त गिरने के कारण हुमायूँ की आकस्मिक निधन हो गई। 

तब से अकबर का संरक्षक बनकर बैरम खां अकबर को हुमायूँ के उस गद्दी के उतराधिकारी के रुप में तैयार करने लगा। जबतक अकबर का फरवरी पंद्रह सौ छप्पन (1556) में मात्र 14 साल के उम्र में हीं राजतिलक नहीं कर दिया, बैरम खां हुमायूँ के आकस्मिक निधन की बात भी छुपाये रखा। 

इस तरह से बैरम खाँ न केवल हुमायूँ बल्कि उसके बाद अकबर के लिए भी एक सहयोगी और संरक्षक बनकर काम करता रहा। हुमायूँ के आकस्मिक निधन के बाद अकबर को भारत का बादशाह बनाने के लिए भी बैरम खाँ स्वयं कई युद्ध लड़ता रहा। 

बैरम खाँ के जीवन की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। बैरम खां बचपन में हुमायूँ के साथ पढ़ता था जिसके बाद वह पहले हुमायूँ का नौकर और बाद में उसका एक बहुत हीं अंतरंग मित्र और सहयोगी भी बन गया। बैरम खाँ नाते में हुमायूँ का साढू भी लगता था।

लेकिन अकबर की दूधमाता माहम अनगा बैरम खाँ के विरुद्ध हमेशा गहरी साजिशें करती रहती थी। जिसके साजिशों के कारण हीं अंत में बैरम खां को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। बैरम खां के खिलाफ इस षड़यंत्र में अकबर की धाय माँ माहम अनगा उसके पुत्र आदम खान का हीं सबसे बड़ा हाथ था। 

लेकिन जब अकबर आगरा को अपनी राजधानी बनाया तो उसके दोनों सेनापति आदम खान और अतगाह खान के बीच भी दुश्मनी बढ़ने लगी जिसके बाद आदम खान ने अतगाह खान की जान ले ली जिस वजह से अकबर ने आदम खान को सजा के तौर पर आगरा के किले की प्राचीर से नीचे फेंकवा दिया जिससे आगम खान की जान चली गई।

अपने बेटे की यह खबर सुनकर माहम अनगा भी तीन दिन बाद हीं इस दुनिया से विदा हो गई। जिसके बाद बादशाह अकबर ने आगम खान और उसकी माता माहम अनगा को यहां कब्र में दफन करा दिया। 

आज से लगभग 460 साल पहले बना आदम खान का यह मकबरा जिसे महरौली के भूलभूलैया के नाम से भी जाना जाता है अष्टकोणीय है जो उस समय के स्थापत्य शैली को देखते हुए एक मकबरे के रुप में काफी असमान्य भी दिखता है। 

खासकर लोदी राजवंशों और अफगानी सूर के लिए इस तरह के अष्टकोणीय मकबरे गद्दारी से भी जुड़े हुए थे। शायद इसी बात और आदम खान के कूकर्मों को ध्यान रखते हुए इतिहास में ऐसी बातें की गई हैं कि अकबर ने आदम खान के मकबरे को भी अष्टकोणीय शैली में हीं बनवाया था।

अंग्रेजों के शासन के समय अट्ठारह सौ तीस (1830) की दशक में भूलभूलैया में स्थित आदम खान के मकबरे को बंगाल सिविल सेवा के सदस्य ब्लेक के निवास में परिवर्तित कर दिया गया था। उसने आदम खान और माहम अनगा की कब्र को तोड़कर उसी जगह अपना भोजन कक्ष बनवा दिया था। 

बाद के दिनों में इस मकबरे को कभी पुलिस स्टेशन, तो कभी पोस्ट ऑफिस, तो कभी एक डिस्पेंसरी के रुप में भी बदला जाता रहा। लेकिन 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में लॉर्ड कर्जन ने आदम खान के मकबरे का फिर से निर्माण कराया। https://www.youtube.com/watch?v=BOGZhUZ9RY0

इस तरह से महरौली  के इस भूलभूलैया में आज जो आदम खान का मकबरा बोला जाता है वह वास्तव में आदम खान का मूल मकबरा भी नहीं कहा जा सकता है। 

लेकिन अंत में यह कहना तनिक भी गलत नहीं होगा कि महरौली में स्थित इस भूलभूलैया की बनावट की तरह हीं महरौली के इस भूलभूलैया के इतिहास के मोड़ में भी भूलभूलैया की तरह हीं कई ऐसे मोड़ भी साथ साथ दिखते हैं जिनकी बातें शायद हीं कभी खत्म हो सकें।

इसीलिए इस लेख के माध्यम से महरौली के भूलभूलैया के इतिहास के बारे में फिलहाल इतना हीं। लेकिन भूलभूलैया के बारे में आपका क्या कहना है यह भी हमें कमेंट कर बताएं। आप पढ़ते रहें देखते रहें

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